Tuesday, May 21, 2024

चिकित्सा विज्ञान को बहुत कुछ करना होगा

 चिकित्सा विज्ञान को बहुत कुछ करना  होगा

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

आजादी के बाद भारत में  चिकित्सा विज्ञान  विज्ञान ने बहुत तरक्की की।इंसान का जीवन काफी सरल कर दिया।गंभीर बीमारी का इलाज खोज  लिया।  दर्द  रहित आपरेशन  होने लगे। दिल −दिमाग समेत सभी क्षेत्र में  तरक्की होने से आदमी बहुत आराम और सुख   महसूस  कर रहा है, किंतु  इतना सब होने के बाद भी अभी  बहुत कुछ किया जाना शेष है।मरीज की छोटी −छोटी परेशानी के इलाज के भी  उपाए करने होंगे।

चिकित्सा विज्ञान इंसान के जीवन को सरल करने की हर बेहतर कोशिश में लगा है,इस सबके बावजूद अभी  बहुत कुछ होना है।हाल में गुजरात में राजकोट के स्टर्लिंग हास्पिटल में मेरे  हृदय की बाई−पास सर्जरी हुई।छोटे बेटे के पास यहां आए थे।यहीं तबियत खराब होने का पता चला।इसलिए मुझे यहीं आपरेशन कराना पड़ा। मुझे सवेरे सात बजे आपरेशन थियेटर में ले लिया गया।आपरेशन थियेटर की टेबिल पर मुझे  लिटाकर स्टाफ  मेरे  हाथ  टेबिल में  बांधता  है।यहां तक मुझे याद है। अब तक सिर्फ दो आपरेशन थियेटर सहायक ही मेरे आसपास थे।  इसके बाद कब चिकित्सक आ गए। कब आपरेशन हो गया। मुझे कुछ पता नही।  दुपहर बाद दो  बजे के आसपास मुझे  लगा कि रोशनी जली है। मुंह में भी  कोई पाइप का  चुभा।मैनें आख  खोलीं।एक बड़े हाल में कुछ बैड पर  मेरे जैसे मरीज लेटे थे। सामने लगी घड़ी दो  बजा रही थी। मेरे मुंह में दिया हुआ  पाइप हलका चुभ  रहा था।  बोलना चाहा तो लगा कि किसी  चीज से मुंह बंद किया हुआ। थकान महसूस हुई। मैंने आंखे बंद  कर लीं।ये भी लगा कि सात घंटे  बाद होश आया है।कुछ समय बाद लोगों के बोलने की आवाज आई। आंखे खोली तो  डाक्टर के साथ मास्क लगाए  मेरे बिस्तर के पास मेरी पत्नी खड़ी है।उसके पूछने पर मैने  इशारों से कहा कि ठीक हूं। डाक्टर ने मुझे  बताया कि आपरेशन बढिया हुआ है। सब ठीक है। चिंता की कोई बात नहीं। डाक्टर का आभार  जताने के लिए मैं हाथ  जोड़ना   चाहता हूं कि लगता  है कि हाथ अभी टेबिल में बंधे  हैं। पत्नी मुझे देखकर चली जाती हैं। कुछ देर में स्टाफ मुंह से  टेप हटाकर मुंह में दी टयूब  निकाल देता  है। हाथ भी  खोल दिए जाते  हैं। अब मैं  आराम  महसूस  कर रहा हूं ।

आपरेशन कब हो गया पता ही नही चला। स्टाफ ने इतना जरूर कहा कि आपके आपरेशन में छह घंटे लगे हैं।आपरेशन तो दर्द  रहित हो गया किंतु परेशानी की कहानी अब शुरू होती है।लगता है कि होठ  सूख  रहें हैं। जीभ  अकड़  रही है। देखरेख के लिए तैनात स्टाफ नर्स से मैं पीने के लिए पानी मांगता हूं।वह मनाकर देती है।  कहती है कि शाम छह बजे  चाय  दी  जाएगी।  उसके पच जाने पर थोड़ा− थोड़ा पानी  मिलेगा। राउंड  पर आए डाक्टर से मैं होथ सूखने और जीभ के अकड़ने की बात कहतां हूं।वह कहते हैं कि इसे तो  बर्दाश्त करना  होगा।किंतु  होठ भिगोने के लिए एक −दो बूंद  पी देने के कह जाते हैं।एक महीना इसी में निकल जाता है। मुह में छाले हो जाने से कुछ खाना संभव नही होता।  न खाने  से सूखी  उलटी होती हैं।दर्द रहित आपरेशन के बाद चिकित्सा विज्ञान को  इस  एक माह की परेशानी का इलाज भी खोजना होगा।

एक बात और उत्तर प्रदेश और दिल्ली एनसीआर में आपरेशन को जाने वाले को आपरेशन की जरूरत के लिए खून का प्रबंध खुद करना  प़ड़ता है। मैं  इसी को लेकर परेशान था कि हम तो घर से बहुत दूर यहां  गुजरात में हैं ,हमें  खून कौन देगा कौन  तीमारदारी करेगा,किंतु अस्पताल में पता भी नही चला।आपरेशन के स्टीमेट में दो बोतल बल्ड का मूल्य  जुड़ा देखकर मैं  संतुष्ठ हो गया कि अब रक्त का प्रबंध  हमें नही करना  होगा। अस्पताल करेगा।

आपरेशन के बाद  और  बाद में आईसीयू और अस्पतालमें भर्ती  रहने के दौरान स्टाफ  का व्यवहार और सेवा कार्य लाजवाब था।

रविवार 12 मई को अंतराष्ट्रीय नर्सेज डे  मनाया गया।राष्ट्रीय नर्स सप्ताह प्रत्येक वर्ष छह मई को शुरू होता है और 12 मई को फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन पर समाप्त होता है। फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिग आन्दोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया व सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल "द लेडी विद द लैंप" (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ था। लेकिन उच्च कुल में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना।

आज अस्पताल के स्टाफ  और  उसके कार्य को  देखता हूं तो  सभी  नर्स में मुझे फ्लोरेंस नाइटिंगेल  नजर आती हैं। सेवा करते वह कभी  बहिन  नजर आती है तो कभी  बेटी  और कभी  मां। ये  अलग बात है कि ये  पैसे के लिए अस्पताल में कार्य कर रही है किंतु इनका समर्पण कही भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल से कम मुझे  नजर नही आया।चिकित्सक भी अपने में लाजवाब हैं। मेरे  हृदय का आपरेशन करने  वाले डा सर्वेशवर प्रसाद  हृदय के  प्रतिदिन तीन −चार आपरेशन  करते हैं किंतु न  उनके चेहरे पर कभी तनाव नजर आता है, थकान।  ये ही हालत   डा सर्वेशवर प्रसाद   के जूनियर्स की भी है।फोन पर डाक्टर और उनके सहायक दिन राज− उपलब्ध हैं।उनके कार्य सेवाभाव और समर्पण को देखकर लगता है कि यह सब ऐसे ही नही है।इसके लिए उनका त्याग और मरीज के लिए सेवाभाव उन्हें प्रसिद्धि दे रहा है।

आपरेशन के दूसरे दिन स्टाफ मुझे  ही नही,  हृदय के आपरेशन के सभी  मरीज को  सहारा देकर बैठाकर देता है।  बाद में  उसे खड़ाकर धीरे− धीरे हाल में घुमाया जाता है।एक से दो घंटे के लिए कुर्सी पर बैठाया जाता  है। कहा  जाता है कि आपका आपरेशन हो गया। अब नियमित जीवन शुरू की जीइए।घूमिए।

इतना   सब होने के बाद महसूस होता  है कि अन्य अस्पतालों की तरह इस अस्पताल में भी  लोकल कंपनी की अधिकतर दवाएं मल्टीनेशनल कंपनी से काफी मंहगी है। मेरे आपरेशन के टांकों में पानी आने के कारण मुझे इंट्रावेनस  एंटीबाइटिक इंजैक्शन   लिखा  जाता है।ये  इंजैक्शन अस्पताल में मैडिकल स्टोर पर  1100  रूपये के आसपास   है, जबकि राजकोट के दवाई के होलसेल मार्केट में यह तीन सौ रूपये का मिल रहा है। होलसेल मार्केट में बस दवाई का बिल नही मिलता।सरकार को अस्पताल के  मैडिकल स्टोर पर बिकने वाली दवा पर  नियंत्रण  करना  पडेगा।  एक चीज और  देखने में आई कि प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड योजना के कार्डधारक अब अस्पताल में निशुल्क  चिकित्सा  सुविधा का लाभ  उठा रहे हैं।लगभग  सभी अस्पताल में आपरेशन के लिए आने वालों  से रिसेप्शन पर ही  पूछा  जाता  है कि आयुष्मान कार्ड  है। कार्ड  देने पर मरीज के प्राय− लगभग सभी  आपरेशन पूरी तरह निशुल्क  हैं। इसमें कोई भेदभाव नही। मरीज हिंदू हो या मुस्लिम बस कार्डधारक होना   चाहिए। प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्डधारक की चिकित्सा सरकार ने निशुल्क करके आम आदमी का उपचार बहुत सरल कर दिया।उसका जीवन सरल बना दिया। इस योजना में अभी  सुधार की जरूरत है।किसी भी प्राइवेट  मेडिक्लेम में आपरेशन के बाद दो  महीने का  दवा का व्यय भी  कंपनी की ओर से देय  है,  जबकि आयुष्मान योजना में अस्पताल की ओर से  मात्र  दस दिन की दवा देने का प्रबंध है, जबकि काफी मरीजों का  उपचार लंबा  चलता है। देखने में आया है कि कुछ अस्पताल आपरेशन के बाद की दस दिन की दवा भी मरीज को नही देते।इसलिए इस योजना में अभी  बहुत सुधार की जरूरत है।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं) 

Wednesday, May 8, 2024

भारत तिब्बत के आजादी आंदोलन का समर्थन कर

 

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

चीन आजकल परेशान है।  बताया जा रहा है कि वह भारत के रवैये  से डरा हुआ है।दुश्मन का डरा होना और परेशान रहना  ज्यादा बेहतर है। इससे  वह अपनी समस्या सुलझाने में लगेगा।अपने दुश्मन देशों को तंग नही करेगा।उन पर दबाव –धौंस नही दिखाएगा।कभी चीन का व्यवहार हमें परेशानी कर रहा है।वह सीमापर घुंसपैंठ करता।क्षेत्र के अंदर आए भारत के भाग में जमता और सौदेबाजी करता। किंतु अब ये बदलता  भारत है। बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी   अब भारत दुश्मन को उसके घर में घुंसकर मार रहा है ।  परिणाम है कि आज  चीन की आंखों में आंखे  डालकर बात की जा रही है।  सूचनाएं हैं कि चीन भारत की ब्रह्मोस से डरा हुआ है जब से भारत का शक्तिशाली  ब्रह्मोस मिसाइल  चीन के करीब तैनात की हैं और चीन के दुश्मन फिलीपींस को दी हैं,तबसे  चीन दहशत में हैं। चीन ब्रह्मोस का काट नही निकाल पा रहा है। वह जानता है कि उसके सारे हथियार भी एक बार फायर की गई  ब्रहमोस  को नही रोक सकते।

ब्रह्मोस की काट निकालने के लिए चीन फिलीपींस को डराने के की कोशिश में जुटा है। चीन ने फिलीपींस के बेहद करीब अपने ड्रोन को भेजा है ताकि फिलीपींस डर जाए। लेकिन चीन का ये कदम बताता है कि असली डर फिलीपींस को नहीं बल्कि चीन को है क्योंकि अब साउथ चाइना सी के बिल्कुल करीब अमेरिकी सेनाएं भी आ गई हैं। भारत पहले ही चीन के शत्रु देश वियतनाम की पीपुल्स नेवी को अपना अधुनिक युद्धपोत  आईएनएस कृपाण का हस्तांतरण कर चुका है।इस युद्ध पोत पर आधुनिक मिजाइल तैनात हैं।दरअस्ल अब तक चीन भारत  को घेरने में लगा था।वह भारत के दुश्मन देशों को  आधुनिक अस्त्र− शस्त्र  की आपूर्ति करने में लगा था। अब ऐसा   उसके साथ  हो रहा है  तो वह परेशान है।चीन भारत में अशांति फैलाने वाले नक्सलाइड, मिजों एव अन्य आंतकियों को आधुनिक शस्त्रों की आपूर्ति करता  रहा है।सूचनाएं रही हैं कि उन्हे प्रशिक्षणा भी दे रहा है।ऐसे में समय की मांग है कि भारत अब   चीन के विरूद्ध चल रहे तिब्बत के  पूर्ण स्वतंत्रता के आंदोलन का खुलकर समर्थन करें।जरूरत पड़ने पर तिब्बती के आजादी के आंदोलन के लड़ाकों को शस्त्र के साथ प्रशिक्षण भी दे।


भारत की नही चीन के रवैये से दुनिया के लगभग  सभी देश परेशान हैं।इसी कारण फिलीपींस और अमेरिकी सेना का साझा युद्धाभ्यास हाल में शुरू हुआ।  इस मिलिट्री ड्रील में जापान की सेनाएं भी शामिल हो रही हैं। 16000 हजार सैनिक साझा युद्धभ्यास में शामिल हैं।  सबसे बड़ी बात कि फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के सैनिक भी कुछ दिन में इस ज्वाइंट एक्सरसाइज से रहेंगे। मतलब पांच  देश चीन को घेरने के लिए एक साथ  होंगे। इस ड्रील में समुद्री और हवाई हमलों का अभ्यास किया जाएगा। भारत के ब्रह्मोस देने के बाद से चीन परेशान है। अभी तो  ब्रह्मोस्त्र तैनात भी नही हुई होंगी कि चीन परेशान है। वह फिलीपींस पर द्रोण उड़ाकर उसे धमका रहा है।सवाल है कि क्या ड्रोन के जरिए चीन ब्रह्मोस के बारे में जानकारी जुटाना चाहता है। सवाल तो ये भी है कि क्या चीन उस ठिकाने का पता लगाना चाहता है, जहां फिलीपींस ब्रह्मोस को तैनात करेगी। चीन ने ड्रोन के अलावा समंदर में मिलिट्री ड्रील के जरिए भी फिलीपींस को आंख दिखाने की कोशिश की है। चीन की नौसेना ने साउथ चाइना सी में लड़ाकू विमानों और युद्धपोत से मिसाइलें दागकर फिलीपींस को डराने की कोशिश की।  

दो दिन के अंदर चीन के ये ये कदम बताते हैं कि चीन ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती से भयभीत है.। चीन के टेंशन इस बात की है कि अब भारत चीन सीमा के साथ चीन-फिलीपींस सीमा पर भी ब्रह्मोस तैनात होगा। अब तो चीन के एक और दुश्मन और पड़ोसी वियतनाम ने भी ब्रह्मोस में दिलचस्पी दिखाई है, जो चीन के लिए खतरे की घंटी है। 

फिलीपींस में भारत की ब्रह्मोस मिसाइल पहुंच गई है और वहां की सैना उसकी तैनाती करेगी। फिलीपींस में अमेरिका ने अपनी नई टायफून मिसाइल प्रणाली तैनात कर रखी है. फिलीपींस में अमेरिका को चार बेस का एक्सेस मिला हुआ है। चीन के करीब जापान पर भी अमेरिका का बेस है। ऑस्ट्रेलिया - सिंगापुर में अमेरिका ने अपना बेस बना रखा है। थाईलैंड और साउथ कोरिया में अमेरिकी सेनाएं तैनात हैं। चीन के करीब गुआम में भी अमेरिका का बेस है। इन जगहों से वक्त पड़ने पर कभी भी अमेरिका चीन पर हमला कर सकता है। चाइना सी के बिल्कुल करीब अमेरिकी सेनाएं भी आ गई हैं। चीनी सेना के प्रवक्ता ने फिलीपीन्स को ब्रह्मोस देने  पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग में इस बात का ख्याल रखा जाए कि इससे किसी तीसरे पक्ष के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल वू कियान ने कहा कि चीन हमेशा मानता है कि दो देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग से किसी तीसरे पक्ष के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को खतरा नहीं होना चाहिए।कर्नल वू कियान ने कहा कि एशिया-प्रशांत में अमेरिका की ओर से बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती का हम कड़ा विरोध करते हैं। अमेरिका का यह कदम क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा को गंभीर रूप से खतरे में डालते हुए क्षेत्रीय शांति को खतरा पैदा करता है।

आज चीन को याद आ रहा है कि दो  देशों के रक्षा सहयोग से तीसरे को नुकसान नही पहुंचना  चाहिए, किंतु  जब वह खुद ऐसा  करता है, ता उसे कुछ याद नही आता।  लंबे सयम से  वह  पाकिस्तान को अधुनिकतम युद्धक शस्त्र देने में लगा हुआ है। वह नही जानता कि पाकिस्तान इन शस्त्रों का  प्रयोग कियादेश के विरूद्ध  करेगा।वह अच्छी तरह से जानता  और समझता है। किंतु अपनो हित में उसे कुछ याह नही आता। अब उसके दुशमन देश भारत, अमेरिका और फ्रांस  आदि ऐसा ही कर रहे हैं तो उसे याद आ  रहा है  तीसरे राष्ट्र को  नुकसान न पहुंचे।

भारत फिलीपीन्स को ही ब्रहमोस  मिजाइल नही दे रहा। वियतनाम भी इस मिजाइल को खरीदने में रूचि दिखा रहा है।यह तै है कि वियतनाम भी  खरीदता  है तो भारत उसे  ब्रह्मोस  देगा। प्रथम वरीयता पर देगा। भारत अपना आधुनिकतम युद्धपोत   खुखरी वियतनाम को  पहले ही उपहार में दे चुका है। ये आधुनिक युद्धास्त्रों से  सज्जित युद्धपोत है।भारत की ये  कार्रवाई दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते आक्रामक रवैये को लेकर चिंताओं के बीच यह भारत और वियतनाम में बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को दर्शाता है। अधिकारियों ने कहा भी  कि भारत ने पहली बार किसी मित्रवत देश को कोई सेवारत पोत उपहार में दिया है।भारतीय नौसेना ने कहा कि पोत पूरी ‘‘हथियार प्रणाली’’ के साथ वियतनाम पीपुल्स नेवी (वीपीएन) को सौंपा गया है। आईएनएस कृपाण, 1991 में सेवा में शामिल किए के बाद से भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े का एक अभिन्न अंग रहा और पिछले 32 वर्षों में कई ऑपरेशन में भाग लिया। लगभग 12 अधिकारियों और 100 नाविकों द्वारा संचालित, जहाज 90 मीटर लंबा और 10.45 मीटर चौड़ा है।

भारत जैसे का तैसा की नीति पर चल चुका है। अब वह कमजोर भी नही है। दुश्तन से आंख में आंख डालकर बात कर रहा है। ऐसे में अब चीन में घाव पर पूरी ताकत से हथौड़ा मारने का समय आ गया।  चीन की बड़ी कमजारी है तिब्बत।  तिब्बत पर उसने कब्जा किया हुआ है।  तिबत की अस्थाई सरकार के धर्मशाला  नगर में चल रही है। भारत के रूख के कारण  तिब्बती अभी तक शांतिपूवर्क आदोलन कर रहे हैं। भारत ने तिब्बत की आजादी की लड़ाई का कभी  समर्थन नही किया। अब समय आ गया है कि भारत इस आंदोलन का समर्थन करें।तिब्बत  सरकार को मान्यता  दे।तिब्बती आंदोलनकारी को शस्त्र और युद्ध प्रशिक्षण दे। जब तक दुश्मन को उसके घर में ही नही घेरा जाएगा, तक तक वह नही मानने वाला।घर में घिर कर वह अपने में उलझ जाएगा और दूसरों को तंग करना  बदं कर देगा।   चीन सरकार वहां बसे उइगुर मुसलमानों पर बेइतहां  जुल्म करने में लगी है।मुस्लिम देश  चुप हैं। भारत अपने परिचित मुस्लिम देश  और संगठनों से उइगुर मुसलमान की आजादी और कल्याण के लिए  आवाज बुलंद कराएं ।

 

 


 

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Sunday, April 28, 2024

देश को संदेश देने में नाकाम रही विपक्ष की रांची रैली

 



अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

विपक्षी दलों की रविवार को झारखंड की राजधानी रांची में  हुई  महारैली    देश को  कोई स्पष्ट  संदेश नही दे सकी। हालाकिं  इससे बड़ी  उम्मीद थी।उम्मीद  थीं कि राजनैतिक दल अपने  चुनाव घोषणा  पत्र अब तक  प्रस्तुत कर चुके  हैं।इस रैली में वे  काँमन मिनीमम कार्यक्रम जारी कर सकतें हैं किंतु ऐसा कुछ नही  हुआ।हर बार की तरह सिर्फ भाषण  तक ही सीमित रही रैली। 

झारखंड की राजधानी रांची में विपक्षी गठबंधन 'इंडियाने 'उलगुलान न्याय महारैलीका नाम दिया गया है। इस दौरान मंच में बड़े-बड़े दिग्गज नेता मौजूद रहे। इसके साथ ही मंच पर दो खाली कुर्सियां रखी गईं। एक जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए और दूसरी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए। उनकी जगह केजरीवाल की पत्नी  नीता केजरीवाल और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन ने मंच साझा किया।भारी संख्या में लोग रैली में पहुंचे
रैली के दौरान भीड़ ने 'जेल का ताले टूटेंगेहेमंत सोरेन छूटेंगेऔर 'झारखंड झुकेगा नहींजैसे नारे लगाए। झारखंड की राजधानी का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास होने के बावजूद भारी संख्या में लोग रैली में शामिल हुए। चिलचिलाती गर्मी के बीच सभी रैली के समर्थन जुटे रहे। 'उलगुलानशब्दजिसका अर्थ क्रांति है। इसे आदिवासियों के अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा मुंडा की लड़ाई के दौरान गढ़ा गया था।

हेमंत सोरेन को कथित भूमि धोखाधड़ी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 31 जनवरी की रात को गिरफ्तार किया था। इसी केंद्रीय एजेंसी ने 21 मार्च को अरविंद केजरीवाल को शराब नीति घोटाले से जुड़े मामले में गिरफ्तार भी किया था। हालांकिझामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष और आप सुप्रीमो के लिए कुर्सियां खाली रखी गई थींलेकिन उनकी पत्नियां कल्पना सोरेन और सुनीता केजरीवाल मंच पर बैठी थीं। कल्पना सोरेन और सुनीता केजरीवाल  का भाषण मुख्यतः  अपने  पतियों की गिरफ्तारी के विरोध में था। दोनों का दावा था कि उनके पतियों को केंद्र की मोदी सरकार  ने गलत ढंग से गिरफ्तार कराया  हुआ  है। केंद्र की मोदी सरकार विपक्ष की आवाज दबा देना चाहती है। इसके लिए सबको एकजुट होना  होगा।रैली में नेताओं  का यह भी   आरोप था कि  केंद्र में भाजपा फिर लौटी तो देश से लोकतंत्र  खत्म हो  जाएगा।  रैली में शामिल नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार झूठ बोलनेगारंटी के नाम पर लोगों को ठगनेलोकतंत्र को कमज़ोर करने और जुमलों के सहारे राजनीति करने के आरोप लगाए।नेताओं ने कहा कि देश में बेरोज़गारी चरम पर है और प्रधानमंत्री मोदी का हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा हवा में घूम रहा है.

देश में पहले चरण के मतदान के ठीक अगले दिन आयोजित उलगुलान न्याय महारैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि पहले चरण के चुनाव में बीजेपी की हवा निकल गई है।उन्होंने कहा कि वे 400 पार की बात करते हैं लेकिन 180-190 सीटों से आगे नहीं जाने वाले. इसलिएवोट देना ज़रूरी है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “पहले चरण में ही उत्तर प्रदेश में इनकी हालत ख़राब हो गई है और जब यूपी इन्हें हटा सकता हैतो आप क्यों नहीं। यह देश मोदी की नहींसंविधान की गारंटी चाहता है।

 जबकि झारखंड में मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस रैली को पूरी तरह फ्लॉप करार दिया है.

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल नाथ शाहदेव ने कहा, “इनके मंच पर भ्रष्टाचार में शामिल नेताओं का जमावड़ा हुआ और ये भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करते हैं. यह हास्यास्पद है।

प्रतुल नाथ शाहदेव ने कहा, “इनका दावा था कि रैली में पांच लाख लोग शामिल होंगे लेकिन आए बमुश्किल 10-15 हज़ार लोग। उनमें आपस में मारपीट हुई। ये लोग सिर्फ़ सत्ता में आने के लिए एक मंच पर आए थे। रैली में सिर्फ़ परिवारवादियों और भ्रष्टाचारियों की भागीदारी थी. इसलिए इसे सुपर फ़्लॉप कहा जाना चाहिए।हालांकि उलगुलान न्याय महारैली में लोगों की खासी भागीदारी देखी गई. झारखंड के सुदूर इलाक़ों से लोग बसोंगाड़ियों और ट्रेनों से रांची पहुंचे।ऐसे लोगों को लाने के विशेष इंतज़ाम किए गए थे. रैली स्थल पर लोगों की भीड़ देर शाम तक जमी रही।

उलगुलान रैली में शामिल होने आई कार्यकर्ताओं की भीड़ में दो गुटों के बीच झड़प हो गयी। कुर्सियां भी तोड़ी गई।

ये मारपीट ,ये  हुडदंग कोई  अच्छा  संदेश  नही दे सकें।

उलगुलान रैली में शिबू सोरेनबसंत सोरेनकल्पना सोरेनयूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादवबिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादवअरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवालपंजाब के सीएम भगवंत मानआप सांसद संजय सिंहशिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदीनेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हुए।रैली में शामिल नहीं हुए राहुल गांधी।जानकारी के मुताबिककांग्रेस नेता राहुल गांधी की तबीयत अचानक खराब हो गई है। इस वजह से वे रैली में शामिल नहीं हुए।

सात चरणों में पूरे  होने  वाले  लोकसभा चुनाव का  पहला  चरण   पूरा हो गया।मतदाताओं ने प्रत्याशियों निर्णय इवीएम को  सौंप  दिया।दूसर चरण  का मतदान 26  अप्रैल  को  होना है।इतना सब होने  पर भी विपक्षी  28 दलों का गठबंधन  अब तक   न कोई  अपना  कॉमन प्रोग्राम प्रस्तुत  कर सका। न नही सभी दलों द्वारा सर्व सम्मत नेता   ही चुना गया।

दरअस्ल विपक्षी दलों का यह गठबंधन ,  उन दलों का भी गठबधंन कहां जा  सकता है, जो दल भाजपा के साथ  नही जा सके। अवसर नही मिला। इस विपक्षी  दलों के आई­.एन­.डी.आई.ए. गठबंधन  को खड़ा  करने में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का बड़ा योगदान रहा।ये सब  उन्ही की मेहनत से खड़ा  ह़ुआ। किंतु मौके की तलाश में  बैठे नितीश कुमार  अवसर मिलते ही इस गठबंधन से किनारा करके  बिहार में भाजपा के साथ गठबधंन कर लिया। भाजपा के साथ मिलकर अपनी सरकार  बनाली।इसी तरह पश्चिमी उत्तर  प्रदेश  के  राष्ट्रीय  लोकदल के जयंत  चौधरी ने किया।भाजपा से   बात पक्की होने  तक वे सपा  के अखिलेश यादव और कांग्रेस के नेताओं के साथ  थे। बात पक्की होते ही  उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन  कर लिया।28 दलों वाले  इस  एलायंस  में प्रायः  वह ही दल हैं  जिनकी अपने  प्रदेश में  सरकार  है।  प्रदेश में  सरकार  होने के कारण वह भाजपा  से गठबधंन नही कर पा रही।

चुनाव का एक चरण बीत गया।दूसारा 26 को   है।इसके  बाद पांच  चरण शेष  हैं।  लगता है कि ये  भी  जल्द ही  हो  जांएगे,  विपक्ष के 28 दलों के एलाइंस इंडिया'  का मिनिमम   कार्यक्रम तै  हुअ। ये  ब्ठकर कोई  ऐसा  एजेंडा भी  नही बना  पाए कि  बहुमत में आने  पर किस कार्यक्रम  पर वे  सरकार  चलांएगे। दूसरा  उनका संयुक्त प्रधानमंत्री कौन होगा¸क्या कुछ प्रदेशों की तरह  तीन या छह− छह माह  में अब प्रधानमंत्री भी बदले  जांएगे।जो भी  हो  विपक्षी  गठबंधन इंडिया  का   जैसे अच्छा  नाम  मिली था,  वैसा कुछ आगे नही हुआ।उसने  निराश  ही किया। देश   का प्रतिनिधित्व  करने  वाले 28 दलों के गठबंधन से उम्मीद काफी ज्यादा  थीं, किंतु  वह एक पर भी  खरा  नही उतर सका। ये सारे दल अलग −अलग विचार और सिद्धांतों के मानने वाले हैं।ऐसे में एकजुट होने के लिए इनका काँमन ऐजेंडा  भी होना चाहिए।  ऐसा न होने पर  इनकी एकजुटता छलावा है।धोखा  है।    अब तो इनका का उददेश्य केंद्र की मोदी सरकार  की आलोचना करना   रह गया।आलोचनाएं भी सकारात्मक नही।नकारात्मक।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार  हैं)

Wednesday, February 28, 2024

छात्रों को नही मिली टयूशन से मुक्ति




केंद्र सरकार  ने  2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)  लागू कर  दी।  इसके हिसाब से पढाई में भी शुरू हो गई किंतु छात्र पर पढ़ाई का बोझ कम नही हुआ।स्कूल के बाद भी बच्चे का  तीन−चार  ट्यूशन पढ़ने पड़ते  हैं।बस्ते का बोझ भी  पहले जैसा ही है, वह भी कम नही हुआ।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत सभी राज्यों में लागू  कर दी।  अब कक्षा   एक  में एडमिशन की उम्र सीमा को लेकर जारी किया गया है।केंद्र द्वारा राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को लिखे पत्र में शिक्षा मंत्रालय (एमओई) के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने 2020 में एनईपी लॉन्च होने के बाद से कई बार जारी किए गए अपने निर्देशों को दोहराया है। इन निर्देशों में  कक्षा एक  में दाखिले के लिए बच्चे की उम्र कम से कम छह  वर्ष होनी चाहिए। इसी तरह का एक नोटिस पिछले साल भी जारी किया गया था.शिक्षा मंत्रालय की ओर से 15 फरवरी 2024 को जारी पत्र में कहा गया है कि नए शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए जल्द ही एमडिशन प्रक्रिया शुरू होने वाली है। उम्मीद है कि राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में अब ग्रेड- एक  में प्रवेश के लिए आयु 6+ कर दी गई है।मार्च 2022 में केंद्र ने लोकसभा को सूचित किया था कि 14 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जैसे असमगुजरातपुडुचेरीतेलंगानालद्दाखआंध्र प्रदेशदिल्लीराजस्थानउत्तराखंडहरियाणागोवाझारखंडकर्नाटक और केरल में उन बच्चों के लिए एक  प्रवेश की अनुमति हैजिन्होंने छह वर्ष पूरे नहीं किए हैं।पूर्व में केंद्र ने कहा था कि एनईपी शर्त के साथ न्यूनतम आयु को संरेखित नहीं करने से विभिन्न राज्यों में शुद्ध नामांकन अनुपात की माप प्रभावित होती है। एनईपी 2020 की 5+3+3+4 स्कूल प्रणाली के अनुसारपहले पांच वर्षों में तीन से छह वर्ष के आयु समूह के अनुरूप प्रीस्कूल के तीन वर्ष और छह से आठ वर्ष के आयु समूह के अनुरूप कक्षा और के दो वर्ष शामिल हैं.केंद्र ने जारी निर्देश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कक्षा एक  में दाखिले के लिए न्यूनतम उम्र सीमा छह वर्ष अपनाने को कहा है।

केंद्र सरकार  नई शिक्षा नीति लागू करने के बाद भी छात्रों के   बस्ते का  बोझ कम नही कर सकी।कई  बच्चों के बस्ते का  बोझ  उनके खुद के वजन से ज्यादा होता है।जबकि ऐसा नही होना  चाहिए ।पीठ पर बोझ लदने से बच्चे का   मानसिक और शारीरिक विकास रूक  जाता है। शिक्षाविद और मनोवैज्ञानिक कई बार बस्तों के बोझ को लेकर चिंता  जारी कर चुके हैं। पर इस पर रोक  नही लगी।छात्र को होमवर्क देना तो  रोजमर्रा  का काम  है।  इसके लिए  उसे दो से  तीन घंटे  चाहिए।स्कूल में पांच घंटे के बाद  दो से तीन घंटे  उसे  होम वर्क करना  है।  इस तरह से छोटे स्तर से ही उस पर आठ नौ घंटे पढ़ाई का बोझ रहता है।यह उम्र  बच्चे के खेलने− कूदने  की है ताकि उसका समुचित शारीरिक और मानसिक   विकास हो। हमारी पोती अमेरिका में पढती है। कक्षा पांच तक  उसे कोई  किताब नही दी जाती। बस स्कूल में ही क्रिटीविटी सिखाई जाती है। कहानी की  पुस्तकें दो घर जाकर पढ़ने को दी जाती हैं ताकि बच्चे  की रीडिंग की आदत   बढ़े।बाकी कुछ नही।

दूसरा भारत का  कितना ही मंहगा स्कूल हो, कक्षा  पांच के बाद छात्र का  टयूशन  पढ़ना  उसकी मजबूरी है। घर आकर होमवर्क में दो −तीन घंटे लगाने के बाद प्रत्येक विषय के टयूशन के लिए उसे  एक घंटा देना ही होता  है। इस ट्यूशन में आने −जाने में भी समय लगता  है।पांच टयूशन  हुए तो  पांच घंटे टयूशन में लगेंगे।एक से दो घंटे आने−  जाने में ।इस तरह से  एक छात्र को  पांच घंटे स्कूल में , एक से दो घंटा  स्कूल से घर आने − जाने में, दो से तीन घंटे होमवर्क करने में, पांच घंटे टयूशन में  और दो घंटे के  आसपास  उसे टयूशन आने – जाने में लगते हैं। इस प्रकार  एक छात्र प्रतिदिन पढ़ाई पर 14 से  17 घंटे लगाता है।  इसके पास खेलने के लिए उसे एक मिनट  का भी समय नही।इसी भागदौड़ में वह बुरी तरह से थककर चकनाचूर हो  जाता है।इस शिक्षा ने बच्चे को पढ़ाई के नाम पर मशीन बनाकर  रख दिया।उससे  बच्चे का  मानसिक और शारीरिक विकास रूक गया। इसके लिए सोचने को न सरकार के पास  समय  है, न शिक्षाविद के पास।ये भी  हो सकता है कि पढाई कें घंटो में पांच− पांच मिनट कम करके एक नया परियड  बनाया जाए।उसमें छात्र को घर के लिए दिया  होमवर्क स्कूल में ही पूरा कराया  जाए।

देश में स्कूल बढ़िया  बन रहे हैं। मोटी −मोटी फीस ली जा रही है। इसके बावजूद इनके भी छात्र टयूशन क्यों पढ़ रहे हैं। महंगे स्कूलों से तो अपेक्षा  की जाती है कि ये  विश्व स्तर की शिक्षा  दें।दरअस्ल देश की शिक्षा के प्राइवेट  सैक्टर में जाने के बाद कुकुरमुत्तों की तरह शिक्षण  संस्थांए   उग गईं।इन  अधिकाशं का  पढ़ाई−लिखाई से कोई लेना  देना  नही।  इनका उद्देश्य तो ऐन− केन प्रकरेण  अभिभावक से पैसा वसूलना  है।सबने  अपने कोर्स तै कर दिए। कहां से  खरीदने हैं ये तै कर दिया। स्कूल ड्रेस ही नही, जूते मौजे,बैल्ट तक स्कूल बेचने  लगे। वह भी   बाजार से कई  गुने मंहगे दामों पर।  कोई देखने  वाला  नही कोई सुनने  वाला  नही।देखने में आ रहा है कि कुछ अभिभावक बच्चे काआईएएस और आईपीएस बनाने की इच्छा और इरादा बच्चे  पर लाद देते  हैं। कक्षा दस के बाद उन्हें आए एस और आईपीएस की तैयारी की कोचिंग देने  वाले संस्थानों में भेज दिया जाता है।इन अभिभावकों के काफी बच्चे पढ़ाई का ये दबाव नही बर्दाश्त कर पाते । वे  डिपरशेन में  चले जाते हैं। कुछ आत्म हत्याएं तक कर लेते हैं।

ऐसे में  सरकार को समान शिक्षा नीति बनाने पर भी सोचना  होगा। ये भी सोचना  होगा कि अभिभावक अपने वार्ड को सरकारी स्कूल में भेजते गर्व महसूस करें। ये माने  की इनमें इनके बेटे – बेटी को प्राईवेट स्कूल से अच्छी शिक्षा मिलेगी।  

शिक्षाविद और सरकार को अपनी शिक्षा नीति में फिर से विचार करने की जरूरत है।जरूरत है ऐसी शिक्षा की जिसमें बच्चे  का समुचित विकास हो।छात्र पर बस्ते   का बोझ कम से कम हो। स्कूल से आने के बाद के घर पर बच्चे को ट्यूशन की जरूरत ही न महसूस हो। बच्चों को घर पर टयूशन पूरी तरह से बंद हों। माध्यमिक स्तर तक छात्र को ऐसी शिक्षा मिले कि स्कूल के बाद  उस पर पढ़ाई  का दबाव  न रहे।  वह आराम  से खेले −कूदे। हां  उसमें कोई हाबी खेल,  गायन, वादन, नृत्य आदि विकसित किया जाना  चाहिए।  एक चीज और स्कूली छात्रों को आत्म सुरक्षा भी इसी स्तर पर सिखा कर इतना निपुण  बना दिया जाए कि वह विपरीत हालात का  समय पड़ने पर मुकाबला कर सके।

 अशोक मधुप

  (लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

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Thursday, February 22, 2024

क्या ये पूरे देश के किसानों का आंदोलन है

 



क्या
 ये पूरे देश के किसानों का  आंदोलन है

अशोक मधुप

पंजाब और हरियाणा को  जोड़ने वाले शंभू बोर्डर पर 13 फरवरी से किसान जमा हैं।सरकार का कहना  है कि उन्हें  आगे नही जाने दिया जाएगा।ये  जाकर  दिल्ली का  आम जीवन प्रभावित करते  हैं। ये बजिद हैं कि हमें दिल्ली जाना  है।शंभू बॉर्डर में किसानों ने घमासान मचाया हुआ है। पुलिस बेरिकेडिंग्स को तहस-नहस कर दिया है। इसके चलते पुलिस ने कई आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया है। कई बार झड़प  हो  चुकी ।  पुलिस को अश्रु गैस छोड़नी पड़ी। आंदोलनकारियों पर पैलेट गन भी  चलानी पड़ी। ये दिल्ली  आने को बजिद हैं।  कुछ जगह इन्होंने   पंजाब में हाइवे के टोल प्लाजा फ्री करा  दिए  हैं। पंजाब में ही रेलवे ट्रैक पर इनका धरना  भी कुछ  जगह जारी है। हालात ठीक नही हैं।  तीन कृषि कानून को वापिस लेने के लिए चले पिछले किसान आंदोलन की सफलता से किसान उत्साहित हैं और अग्रेसिव हैं। किंतु  सवाल यह है कि क्या ये  देश के किसानों का  आंदोलन है।  इसमें तो  पंजाब के भी  पूरे किसान संगठन शामिल नही हैं।

इस आंदोलन को  देखकर ऐसा लग नहीं रहा कि किसान वापस जाएंगे। इस बार किसान अपनी अलग-अलग मांगों को लेकर अड़े हुए हैं।इनकी मांग हैं, किसान नेता न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानून बनाए ,किसानों ने दिल्ली मोर्चा के दौरान केंद्र सरकार की ओर से जिन मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया गया था ,उन्हें तुरंत पूरा करे, साल 2021-22 के किसान आंदोलन में जिन किसानों पर मुकदमें दर्ज किए गए थेउन्हें रद्द करने किया  जाए,पिछले आंदोलन में जिन किसानों की मौत हुई थीउनके परिवार को मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए,लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को केंद्र सरकार न्याय दे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दें,सभी  किसान और खेतिहर मजदूरों का कर्जा माफ हो ,60 साल से ऊपर के किसान, मजदूरों  को 10 हजार रुपये पेंशन मिले,कृषि व दुग्ध उत्पादोंफलोंसब्जियों और मांस पर आयात शुल्क कम करने के लिए भत्ता बढ़ाया जाए, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए,कीटनाशकबीज और उर्वरक अधिनियम में संशोधन करके कपास सहित सभी फसलों के बीजों की गुणवत्ता में सुधारी जाए  आदि ।

आंदोलनकारी किसान नेताओं से  केंद्र सरकार तीन दौर की इनसे बातकर चुकी किंतु समस्या  का हल नही निकल रहा। पंजाब में किसानों के  40 संगठन हैं। इस बार के इस आंदोलन में  32 संगठन शामिल है।  एक बड़ा  सवाल यह है कि क्या से सिंधु  बार्डर  पर जमें किसान पूरे देश के किसानों का  प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या इन्हें आम नागिरकों का  जीवन प्रभावित करने का  अधिकार है?इस आंदोलन को भी साल 2021 के आंदोलन से ही जोड़कर देखा जा रहा हैलेकिन इस बार के आंदोलन को सभी किसान संगठनों का समर्थन हासिल नहीं है।इस आंदोलन की बात यह है कि ये आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले नहीं हो रहा। पंजाब के भी सभी  किसान संगठनों का ये आंदोलन नही है।हरियाणा के एक अन्य प्रमुख किसान नेताबीकेयू चढूनी समूह के प्रमुख गुरनाम सिंह चढूनी ने  बताया कि उन्हें 'दिल्ली चलो मार्चऔर चंडीगढ़ में सरकार के प्रतिनिधियों के साथ होने वाली बैठकों में आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने कहा, 'एमएसपी पर कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं हैकेंद्र सरकार का लिखित आश्वासन ही काफी है' पूर्ववर्ती संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल रहे कुछ बड़े किसान नेताओं को यह भी संदेह है कि 'दिल्ली चलो मार्चअप्रत्यक्ष रूप से पंजाब सरकार द्वारा  प्रायोजित हैक्योंकि उसे मूंग के लिए एमएसपी जैसे चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रहने के कारण किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।हरियाणा सरकार द्वारा पंजाब सरकार पर आरोप लगाए गए हैं कि पंजाब ने उन प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जो बिना किसी बाधा का सामना किए बड़ी संख्या में शंभू और खनौरी सीमाओं तक पहुंचने में कामयाब रहे।बीकेयू के राकेश टिकैत  का भी मानना ​​है कि मौजूदा विरोध प्रदर्शन में कुछ कट्टरपंथी तत्व शामिल हो रहे हैं ! बातचीत मेंराकेश टिकैत ने कहा कि वर्तमान आंदोलन में भाग लेने वाले कई नेता सतलज-यमुना लिंक नहर जैसे मुद्दों को उठाना चाहते हैंजो पंजाब और हरियाणा के किसानों के बीच दरार पैदा कर सकते हैं. इसी तरहकुछ लोग सांप्रदायिक मतभेद भी पैदा करना चाहते हैं. इसलिएहम उनके आंदोलन में नहीं शामिल हैंलेकिन हम उन उन्हें मुद्दा-आधारित समर्थन प्रदान कर रहेंगे। राकेश टिकैट ने सिसौली की बैठक के बाद कहा कि 21 फरवरी को जिला मुख्यालयों पर ट्रैक्टरों के साथ प्रदर्शन  होगा। राकेश टिकैट ने कहा कि पंजाब में तीन मोर्चे हैं जिनमें से एक मोर्चा आंदोलन कर रहा है। यह संयुक्त किसान मोर्चा का आह्वान नहीं था और ना किसी से बात हुई थी लेकिन हम किसानों के साथ हैं। किसानों पर अत्याचार होगा तो हम चुप नहीं रहेंगे।कभी  किसानों के  देश का बडा केंद्र  सिसौली था, किसानों की मांग और समस्याओं को  लेकर यहां से मांग उठती थी।  आंदोलन के  निर्णय भी सिसौली से ही होते थे, अब ये  सब पंजाब में  चला गया। वहां आंदोलन की बात चलती है तो  समर्थन देना अब सिसौली की  मजबूरी हो  जाती है।

लोकसभा चुनाव से पहले प्रस्‍तावित किसान आंदोलन को बेहद ही अहम माना जा रहा है।  इन  पंजाब के आंदोलनकारी किसान  ने मानकर आए  हैं, कि चुनाव सिर  पर हैं, ऐसे  में दबाव देकर वह अपनी मांग पूरी करा सकतें हैं।  असल में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्‍ली की सीमाओं पर 13 महीने तक चले आंदोलन पर केंद्र सरकार  ने तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया था।इससे  वह उत्साहित हैं और सोचे बैठें हैं कि वह दबाव देकर सरकार  से अपनी मांग पूरी करा  लेंगे। हालाकि संयुक्त  किसान मोर्चा ने 16 फरवरी के  भारत बंद का आह्वान करके देख  लिया, कि पंजाब  में ही   उसके बंद का असर हुआ,  बाकी सब जगह सामान्य  रहा।

दरअस्ल सरकार भी किसानों को प्रसन्न करने के लिए उल्टे –सीधे  निर्णय लेती रहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2019 में किसान सम्मान निधि की शुरूआत  की। इसके तहत किसान को  साल में छह हजार रूपया अर्थात महीने का 500 रूपया किसान को दिया  जाता  है।  इसे  देने की क्या जरूरत थी। आज के मंहगाई  के युग में इस 500 रूपये की राशि से  क्या होता  है?  इस  निर्णय से मोदी सरकार ने  केंद्र पर करोड़ो रूपये प्रतिवर्ष   का  बोझ बढ़ा दिया। ये निर्णय ऐसा  है  कि आगे आने वाली  सरकारें किसानों को प्रसन्न करने के लिए उस सम्मान निधि की राशि बढ़ाएंगी ही, कम नही कर पांएगी।  समाज में और भी  वर्ग हैं । सबसे  बड़ा वर्ग  व्यापारी है। वह सरकार को लगातार टैक्स  देता है।सरकार उसे  क्या देता है। यही  हाल  आयकरदाता का है। पत्रकारों के लिए  कभी सरकारी स्तर से कुछ नही हुआ।  जब आप खुद किसानों को सम्मान निधि के नाम पर धन बांटने   लगोगे तो  फिर तो  वह आगे चलकर उल्टी साधी मांग करेंगे ही ।  किसान को किसान क्रेडिट कार्ड दिया हुआ है। इस पर चार प्रतिशत पर कर्ज दिया  जा सकता  है। सहकारी समिति तो डेढ  प्रतिशत पर कर्ज देने लगी। पिछली कुछ सरकारों  ने किसानों के कर्ज माफ किए हैं।  बिजली बिल माफ  किए हैं तो अब तो  ये मांग  होनी स्वाभाविक है। किसान नेता  कहते  हैं कि सरकार व्यापारियों के कर्ज माफ  करती रही है। व्यापारी को कोई कर्ज वैसे ही नही देता। दी  गई  राशि से  ज्यादा मूल्य की सपत्ति रहन रखता है।  कुछ बड़े व्यापारी जो देश से बाहर भाग  गए ,उनकी  भी देश में मौजूद संपत्ति सरकार  जब्त करने में लगी है।

कल  रविवार में केंद्र के तीन  मंत्रियों की आंदोलनकारी किसान  नेताओं से बात हुई।केंद्र सरकार धान और गेंहू के अलावा  मसूर,उड़द, मक्का और कपास पर भी न्यूनतम मूल्य देने को  तैयार हो गई  है किंतु  इसके लिए किसानों को  एनसीसीएफ,नेफेड और सीसीआई से  पांच  साल के लिए अनुबंध  करना होगा। किसान नेताओं ने सरकार के फैसले पर विचार करने का  निर्णय लिया है।किसान नेता  21 फरवरी से   पहले  सरकार  को जवाब देंगे।इस दौरान आंदोलन जारी रहेगा।उम्मीद  है कि पिछली बार वाला   अडियल रूख किसान नेता  नही अपनाएंगे।  समस्या का  समाधान निकल आएगा। पर सरकार  को यह तो  सोचना  ही पड़ेगा कि देश में  किसान ही अकेला  उत्पादक नही है।और भी  हैं। व्यापारी भी हैं, वे भी  उत्पादक हैं। घाटे में आने पर  उनके भी प्रतिष्ठान बंद  हो  जाते  हैं। व्यापारी से  तो  बिजली की दर और ज्यादा  वसूली जाती है।उनके लिए भी   सरकार को   सोचना और करना चाहिए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)