Thursday, February 6, 2025

कैसे रुकें सिवरेज की सफाई में होने वाली मौत?

 

कैसे रुकें सिवरेज की सफाई में होने वाली मौत?

अशोक  मधुप

वरिष्ठ पत्रकार 

 कोलकता शहर में सिवरेज की सफाई के दौरान तीन श्रमिकों की मौत हो गई।घटना कोतकता  लेदर कंप्लेक्स में सीवरेज लाइन के साफ के दौरान हुई। सुपरिम कोर्ट काफी पहले  कह चुका है कि मरने वालों के परिवार को तीस −तीस लाख रूपया मुआवजा दिया जाए, किंतु ऐसा नही हो रहा। प्रदेश सरकार ने बीस − बीस लाख रूपये मुआवजा देकर ही मामला निपटा दिया। यह घटना सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के चार दिन बाद हुई है, जिस  आदेश में सुपरिम कार्ट ने कहा कि कि दिल्ली ,मुंबई, कलकत्ता, चिननई,बंगलूरू और हैदराबाद जैसे मैट्रोपालिटिन शहरों में मैनुअल सफाई और सीवर सफाई पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था।दरअस्ल न्यायालय आदेश करता है किंतु  उन आदेश के पालन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को   या तो ये आदेश  पंहुच नही पाता।आदेश पंहुच पाता है तो फाइलों के दबाव में वे उसे पढ़ नही पाते।इसीलिए बार बार आदेशों के  पालन में अनदेखी होती है। इन आदेशों को संबधित अधिकारियों तक पंहुचाने की प्रदेश स्तर पर त्वरित और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

जुलाई 2022 में लोकसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार पांच साल में सीवर सफाई के दौरान 347 लोगों की मौत हुई। पांच सालों में भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान कम से कम 347 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 40 प्रतिशत मौतें उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और दिल्ली में हुईं।सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, 1993 के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक से होने वाली मौतों के 1,248 मामलों में से इस साल मार्च तक 1,116 मामलों में मुआवजे का भुगतान किया गया है. हालांकि, 81 मामलों में मुआवजे का भुगतान अभी भी लंबित है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि राज्यों द्वारा 51 मामले बंद कर दिए गए हैं क्योंकि मृत व्यक्तियों के कानूनी उत्तराधिकारी नहीं मिल सके। 1993 के बाद के आंकडा से पता चलता है कि कि सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों के सबसे अधिक 256 मामले तमिलनाडु में सामने आए. इसके बाद गुजरात (204), उत्तर प्रदेश (131), हरियाणा (115) और दिल्ली (112) का नंबर आता है. सीवर से होने वाली मौतों के सबसे कम मामले छत्तीसगढ़ (1) में दर्ज किए गए हैं, इसके बाद त्रिपुरा और ओडिशा में 2-2 मामले, दादर और नगर हवेली (3) और झारखंड (4) आते हैं।अप्रैल 2023 से मार्च 2024  तक के 58 मामलों में से सबसे ज्यादा मामले तमिलनाडु (11) से हैं, इसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान (11-11 मामले), और गुजरात (8) तथा पंजाब (6) का नंबर आता है.आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 1993 के बाद से हुई 1,247 मौतों में से 456 मामले 2018 के बाद दर्ज किए गए हैं।

नौ  अक्तूबर 2024 को दिल्ली के सरोजिनी नगर इलाके में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर तीन मजदूरों की मौत का मामला सामने आया है। ये  मजदूर सीवर लाइन साफ करने के लिए सीवर के अंदर उतरे थे।  सीवर लाइन से निकल रही जहरीली गैस की वजह से तीनों मजदूरों का दम घुट गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि सीवर में उतरे मजदूरों के लिए सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे।

23 अक्तूबर 2024 को राजस्थान के सीकर जिले में सफाई के दौरान तीन कर्मचारियों की मौत हो गई। ये मौत लगातार होती रहती है।रूक नही पातीं ।

 देश में सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौत की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2023 को कहा था कि सरकारी अधिकारियों को मरने वालों के परिजन को 30 लाख रुपए मुआवजा देना होगा।सीवर की सफाई के दौरान कोई सफाईकर्मी ​​​​​​स्थायी दिव्यांगता का शिकार होता है तो न्यूनतम मुआवजे के रूप में उसे 20 लाख रुपए दिया जाएगा। वहीं, अन्य दिव्यांगता पर अफसर उसे 10 लाख रुपए तक का भुगतान करेंगे।जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म हो। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स को सीवर से होने वाली मौतों से संबंधित मामलों की निगरानी करने से ना रोके जाने का निर्देश दिया।

सरकारे और अधिकारी प्रायः मानते हैं कि न्यायालय आदेश करता रहता है।वह करे।उन्हें काम अपनी मर्जी से करना है।इसी कारण सिवरेज की सफाई में लगे कर्मचारियों को कार्य के दौरान न सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करांए जाते हैं न मौत होने पर मुआवजा दिया जाता है। पीड़ित के परिवार वाले न ज्यादा शिक्षित होते हैं, न संपन्न।उन्हें न्यायालय के आदेश की जानकारी ही नही होती।इतना धन भी नही होता कि वह न्यायालय की शरण में जाएं। इसका फायदा विभागीय अधिकारी उठाते हैं।वह अपनी मनमर्जी  करते हैं।ऐसा प्रायः सभी जगह होता है।सिवरेज की सफाई में लगे कर्मचारियों की मौत की घटनाएं रोकने के लिए, उन्हें मैनुअल सिवरेज की सफाई के आदेश देने वालों पर  हत्या का मुकदमा दर्ज कराने से ही मौत रूकेंगी, अन्यथा नही।

प्रदेश  सरकारों को चाहिए कि वह एक ऐसा सेल बनाए, जो इस तरह की मौत की मोनिटरिंग करें। उनकी मौत के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई भी अमल में लाए।एक बात और राज्य स्तर पर बनाये सैल न्यायालयों  के आदेश नगर पालिका, नगर निगम आदि में भेजने की भी   तुंरत व्यवस्था हो।बताए कि यह आदेश हुआ है।सिवरेज की सफाई कराते इन नियमों का पालन करें।ये सैल ये भी मोनिटरिंग करें कि नगर निगम या नगर पालिका के पास  सिवरेज की सफाई के समय प्रयोग होने वाले उपकरण हैं या नही। क्या उनके कर्मचारी सफाई करते सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग करते हैं या नही। जहां प्रयोग नही करते वहां कर्मचारियों को जागरूक किया जाए। उनके इन सुरक्षा उपकरणों के प्रयोग के लाभ बताए जाएं।उन्हें कहा जाए कि सिवरेज में उतरने से पहले सुरक्षा उपकरण  पहनने से उनकी जान बच  सकती है।देखने में आया है कि प्रायः स्थानीय निकाय के के पास सुरक्षा  उपकरण  ही नही हैं।उन्हें दबाव देकर ये उपकरण खरीदवाएं जाएं। कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण  पहनने की प्रशिक्षण  दिया जाए।

 स्थानीय निकायों को कहा जाए कि वह मैनुअल सिवरेज की सफाई न कराएं।इसके लिए उपकरण खरीदें। जिन स्थानीय निकायों के पास इन उपकरण खरीदने के लिए धन नही है, उन्हें धन उपलब्ध कराया जाए।सरकारों के इस मामले में गंभीर होने से ही सिवरेज की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की मौत की घटनांए रूक सकेंगी।सिवरेज की सफाई में मरने वाले कर्मचारियों के परिवार अनाथ होने से बच जाएगें।

अशोक  मधुप

 ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

Monday, January 20, 2025

क्या इरडा बीमा कंपनियों की नकेल कस सकेगा?

 क्या इरडा बीमा कंपनियों  की नकेल कस सकेगा?

अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

बीमा कंपनियों के बारे में हाल ही में इरडा ( भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण) ने एक  रिपोर्ट जारी की है कि बीमा कंपनियां बीमा खरीदार द्वारा किए 100  रूपये के भुगतान पर 86 रूपये ही क्लेम देती हैं।इस रिपोर्ट में  और भी बहुत कुछ है किंतु इरडा ने यह नही बताया कि कम भुगतान करने वाली कंपनियों पर इरडा क्या कार्रवाई कर रही है?कितने मामलों में उसने पूरा भुगतान कराया?इस व्यवस्था में सुधार के लिए उसके द्वारा किए गए निर्णय क्या हैं?बिल प्राप्त हो जाने के बाद बिलों भुगतान क्यों नही हो रहा?भुगतान में विंलब की अवधि का उपभोक्ता  को सूद क्यों नही दिलाया जा रहा?

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सामान्यस्वास्थ्य और सरकारी बीमा कंपनियां 100 रुपये का प्रीमियम लेकर सिर्फ 86 रुपये ही क्लेम देती हैं। कुछ बीमा कंपनियां तो 100 रुपये के एवज में 56 रुपये ही क्लेम दे रही हैं।रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023-24 में सामान्य बीमा कंपनियों ने पॉलिसीधारकों को दावे के एवज में 76,160 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह 2022-23 की तुलना में 18 फीसदी अधिक है।

2023-24 में बीमा कंपनियों ने कुल 83 फीसदी दावों का निपटान किया और 11 फीसदी खारिज कर दिया। छह फीसदी दावे 31 मार्च2024 तक लंबित रहे। इस अवधि में सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने कुल 2.69 करोड़ स्वास्थ्य दावों का निपटान कर 83,493 करोड़ रुपये का भुगतान किया। प्रति क्लेम औसत रकम 31,086 रुपये रही। विश्लेषकों का कहना है कि प्रीमियम लेने और दावों के निपटान में क्रमशः 100 फीसदी और 80 फीसदी का औसत ठीक-ठाक है।

कुल दावों में से 72 फीसदी थर्ड पार्टी (टीपीए) ने निपटाए। बाकी 28 फीसदी दावों का निपटान कंपनियों ने अपने तरीके से किया। 66.16 फीसदी दावे कैशलेस तरीके से निपटाए गएजबकि 39 फीसदी में रिइंबर्समेंट मिला।

सरकारी कंपनियों का क्लेम 100 रुपये के प्रीमियम के एवज में 90 रुपये से अधिक रहा है। नेशनल इंश्योरेंस ने 100 रुपये प्रीमियम लेकर 90.83 रुपये क्लेम दिया है। न्यू इंडिया ने 105.87 रुपयेओरिएंटल ने 101.96 रुपये और यूनाइटेड इंडिया ने 109 रुपये क्लेम दिया है। सभी सरकारी बीमा कंपनियों का क्लेम औसत 103 रुपये रहा है।

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सामान्यस्वास्थ्य और सरकारी बीमा कंपनियां 100 रुपये का प्रीमियम लेकर सिर्फ 86 रुपये ही क्लेम देती हैं। ये इरडा की रिपोर्ट है, जबकि सच्चाई कुछ और है। आप क्लेम मांग  कर देखिए ,ये कंपनियां कितना परेशान करती हैं। उपभोक्ता के बिल में  मनमर्जी  की कटौती तो आम बात है। इरडा  जो  बीमा कंपनियों पर नियंत्रण करती है।उनकी गतिविधियों पर रोक लगाती है।उसका कार्य है कि बीमा कंपनियों द्वारा अवैघ रूप से रोके गए भुगतान दिलाए।  उसके नियंत्रण के बावजूद  क्यों नही बीमा कंपनियों पर सही से नियत्रंण नही हो रहा। इरडा ने कहा कि  बीमा कंपनियां 100 रूपये के प्रीमियम पर 86 रूपया ही क्लेम दे रही है । रिपोर्ट में यह भी कहा गयाहै कि है। कुछ बीमा कंपनियां तो 100 रुपये के एवज में 56 रुपये ही क्लेम दे रही हैं।इरडा ने ये रिपोर्ट तो जारी कर दी किंतु यह नही बताया कि प्रीमियम की  एवज में कम भुगतान करने वाली बीमा कंपनियों के विरूद्ध वह क्या कार्रवाई कर रहा है?वह ऐसा कर कर रहा है कि बीमा कंपनियां पूरा भुगतान दें। उसे इस रिपोर्ट पर उठाए गए कदम और आदेश भी बताने चाहिए थें।

दरअस्ल  बीमा कंपनियों की भुगतन में मनमर्जी चलती है।बीमा कराने वाले की कोई नही सुनता। मेरा ओरिंयटल इंशोरेंस कंपनी का दस लाख का मैडिक्लेम है।दस साल से पुरानी पोलिसी है। पहले यह बीमा पांच लाख रूपये का था। लगभग छह साल पहले मैंने इसे बढ़ाकर दस लाख का करा लिया।दस लाख में मैं और मेरी पत्नी दोनों कवर है।मैंने लगभग  चार साल पहले  अपनी पत्नी की आंख का मोतियाबिदं का आपरेशन देहरादून के अमृतसर  क्लीनिक में कराया। कंपनी का कहना है कि मोतियाबिदं के आपरेशन में हम चालिस हजार रूपये  का भुगतान करेंगे। आपने खर्च कितना ही किया हो, हमें इससे कुछ नही लेना।मैंने दोनों आखों के आपरेशन का 40− 40 हजार रूपये  का बिल कंपनी को  भेजा । पहले आपरेशन का इन्होंने अपनी मनमर्जी से 22 हजार का भुगतान किया। दूसरी आंख का चालिस हजार रूपये का भुगतान दिया। मैंने लिखा पढ़ी की तो उत्तर आया कि हम कर सकते हैं। हमने कर दिया।काफी लिखा पढ़ी करने  और धमकाने पर काफी समय बाद बचे 18 हजार रूपये भुगतान किया।इसके बाद मैंने घुटनों का ट्रांसप्लांट कराया।पहले घुटने का बिल भेजा। दो लाख 38 हजार का। इन्होंने भुगतान किया  दो लाख 36 हजार का।दूसरे घुटने के  आपरेशन का बिल बना दो लाख 42 हजार । इन्होंने इस भुगतान किया दो लाख 38 हजार । यह ठीक था । इतनी कटौती हो सकती है।इस पर किसी भी उपभोक्ता को आपत्ति नही होगी।

 पिछले साल मैं छोटे बेटे के पास राजकोट में था।वहां मुझे बाईपास सर्जरी करानी पड़ी।इस  सर्जरी का खर्च में इन्होंने करीब  70 हजार की कटौती की।इसमें 55 हजार के आसपास  आपरेशन के दौरान अस्पताल द्वारा मुझे खिलाए भोजन के साथ ही  आपरेशन में प्रयुक्त हुए सामान निडिल, ग्लोबज और सिरेंज  आदि के व्यय की की गई। अब को इनसे पूछने वाला नही कि आपरेशन के दौरान अस्पताल में रहने के दौरान क्या मरीज भोजन नही करेगा? क्या बिना भोजन किए आठ दिन रहा जा सकता है? इंजेक्शन सिरेंज , निडील ,ग्लोबस आदि के बिना आपरेशन हो सकता है, ? कितुं कोई सुनने वाला  नही।ये मेरा ही नही औरों का भी ये ही किस्सा है। उन्होने भी कहा कि उनके भी आपरेशन में प्रयोग हुईं  निडिल सिरेंज गलोब्स के भुगतान में मनमर्जी है। किसी केस में भुगतान कर देते हैं किसी में नहीं। ये समझ नही  आता कि भुगतान में  बीमा कंपनियों मनमर्जी क्यों करती हैं?  इरडा को स्पष्ट आदेश करना चाहिए कि वे क्या भुगतान करेंगी क्या नही।ये ही आदेश वाहनों के बारे में होना चाहिए।   इरडा ने पीछे आदेश किया कि अप्रेल 2024 से सभी  अस्पताल में कैशलेश की सुविधा मिलेगी, किंतु सभी कंपनी ऐसा नही कर रही। एक बात और अप्रेल 2024 से पहले अस्पताल को कैशलैश के पैनल में शामिल करने में भी बड़ा खेला है।प्राइवेट कंपनियां  तो केशलैश के पैनल में अस्पताल को शामिल करने में बहुत उदार हैं, कितुं सरकारी  कंपनी नहीं ।पत्नी की आखों का मोतियांबिंद का आपरेशन देहरादून के प्रसिद्ध  25 साल से ज्यादा पुराने अस्पताल अमृतसर आई क्लीनिक में कराया। इतना पुराना ये अस्पताल ओरियंटल इंशोरेंस कंपनी के पैनल में नही था ।गुजराज का स्टर्लिंग अस्पताल वहां का बड़ा और 25 साल पुराना अस्पताल है।इसकी गुजरात में कई ब्रांच है।यह भी  इस कंपनी के पैनल में नही है।छोटे शहरों के अस्पताल की तो बात ही क्या की जाएं।  पिछले अप्रेल से इरडा ने आदेश किया है कि पैनल में न होने वाले अस्पतालों में भी कैशलैश की सुविधा मिलेगी, किंतु अब भी इन कंपनी की मनमर्जी  चल रही है। सभी को कैशलैश की सुविधा नही मिल रही।मजबूरन लोगों को अस्पताल को पहले खुद भुगतान करना पड़ता है, बाद में बीमा कंपनी भुगतान करती हैं, वह भी मनमर्जी से । इस भुगतान में भी कई –कई माह लगा देती हैं। इरडा को चाहिए कि बीमा कंपनियों को यह भी आदेश करे कि बीमा कंपनियां बिल प्राप्त होने के बाद 15 दिन में बिल की राशि का भुगतान करें। भुगतान में विलंब होने पर बाजार दर से उपभोक्ता को  उसके बिल की राशि पर सूद दे।  

अशोक मधुप

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Thursday, January 16, 2025

अखबारों की सुर्खी नही बना प्रवासी सम्मेलन

  अखबारों की सुर्खी नही बना  प्रवासी सम्मेलन

अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

आठ से दस जनवरी  तक चला 18वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन अखबारों की सुखियां भी नही बन सका।उड़ीसा राज्य के भुवनेश्वर में हुए इस  तीन दिवसीय सम्मेलन की कामयाबी पर न लेख लिखे गए न संपादकीय।  ये  सम्मेलन एक रूटिन का कार्यक्रम ही बन कर रह गया।सरकार ये वह भी नही बताया कि देश की विकास याजनाओं में बाधक देश में फैले   भ्रष्टाचर को रोकने की उसकी क्या योजनाएं हैं?प्रवासी भारतीयों के भारत के विकास में योगदान के लिए आने वाले प्रोजेक्ट की अनुमति आदि की मानिटरिंग के लिए उच्च स्तर पर इसकी देखरेख करने के लिए क्या करने का इरादा हैं? उच्च स्तर पर ये भी   देखा जाए कि  प्रोजेक्ट की अनुमति में अनावश्यक विलंब तो नही किया जा रहा?रिश्वत की चाहत में उद्योगपति को परेशान तो नही किया जा रहा?   

इस बार के प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का विषय-‘विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान’ जरूर रहा किंतु इसमें न कोई निर्णय हुए न कोई विशेष प्रस्ताव। प्रवासियों को भारत के चुनाव में मत देने का अधिकार है, किंतु न वे वोट बनवाने में रूचि रखते हैं, न वोट डालने में। उनसे वोट बनवाने और देश के विकास के लिए अपनी सरकार बनाने के लिए वोट करने की अपील की जा सकती थी किंतु वह भी नही की गई। 2003  से मनाना  शुरू हुई  प्रवासी सम्मेलन अभी तक एक औपचारिकता ही लगा।

भुवनेश्वर में  इस प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन की शुरुआत बुधवार को   विदेश मंत्री एस जयशंकर के उदबोधन से हुई। उन्होंने प्रवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों से 'विकसित भारत' के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान किया। ओडिशा को असीमित अवसरों की भूमि बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने गुरुवार को प्रवासी भारतीयों से राज्य की विकास यात्रा में भाग लेने का आह्वान किया।

इस प्रवासी भारतीय दिवस के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए श्री माझी ने कहा, “ओडिशा सिर्फ़ अपने गौरवशाली अतीत और प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं जाना जाता; यह भविष्य के लिए असीम अवसरों की भूमि है।” ओडिशा के निवेशक-अनुकूल वातावरण पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य अब भारत में निवेश के लिए सबसे स्वागत योग्य स्थलों में से एक है। मुख्यमंत्री ने कहा, "मैं आप सभी से इन अवसरों का लाभ उठाने और अपनी मातृभूमि के विकास और समृद्धि में योगदान देने का आग्रह करता हूं। वैश्विक भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्य के रूप में, आप दुनिया के लिए हमारे राजदूत हैं। मैं आपको ओडिशा और भारत के लिए एक उज्ज्वल भविष्य को आकार देने में हमारे साथ हाथ मिलाने के लिए आमंत्रित करता हूं। हम सब मिलकर 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।"

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौ को जनवरी,  सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि आज विश्व भारत की बात सुनता है, तथा देश अपनी विरासत के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह बताने में सक्षम है कि भविष्य युद्ध में नहीं, बल्कि बुद्ध में निहित है।

इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासी भारतीय एक्सप्रेस को भी हरी झंडी भी दिखाई। यह भारतीय प्रवासियों के लिए स्पेशल टूरिस्ट ट्रेन है, जो दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से चली और तीन सप्ताह तक कई टूरिस्ट प्लेसेज तक जाएगी। विदेश मंत्रालय की प्रवासी तीर्थ दर्शन योजना के तहत इसका संचालन किया जा रहा है। गौरतलब है कि इस कार्यक्रम के लिए 70 देशों से तीन हजार से ज्यादा प्रतिनिधि ओडिशा पहुंचे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को सम्मेलन में चार प्रदर्शनियों का उद्घाटन किया, जिनमें भारत की सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और प्रवासी भारतीयों के योगदान को प्रदर्शित किया गया। उन्होंने कहा कि  प्रवासी भारतीय दिवस, भारत और उसके प्रवासियों के बीच संबंधों को प्रगाढ़ करने वाली एक संस्था बन चुकी है। श्री मोदी ने उल्‍लेख किया कि हम सब मिलकर भारत, भारतीयता, अपनी संस्कृति और प्रगति का उत्‍सव मनाते हैं और साथ ही अपनी जड़ों से जुड़ते हैं।राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने 10 जनवरी के समापन सत्र में प्रवासी भारतीयों को संबाधित किया। और प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि प्रवासी भारतीय हमारे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान हैं। चाहे वह प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कला या उद्यमिता का क्षेत्र हो, प्रवासी भारतीयों ने अपनी ऐसी छाप छोड़ी है जिसे दुनिया स्वीकार करती है और सम्मान देती है।

दुनिया भर से आए सैकड़ों प्रवासी भारतीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए भुवनेश्वर के जनता मैदान में एकत्र हुए। उन्होंने गर्मजोशी से स्वागत और इस आयोजन की तैयारियों को लेकर ओडिशा की सराहना की। प्रवासी भारतीयों ने कहा कि यह आयोजन राज्य की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का अनुभव करने का एक बेहतरीन अवसर प्रदान कर रहा है।

पचास वर्षों से स्लोवेनिया में रहने वाली एक प्रवासी भारतीय कोकी वेबर ने इस आयोजन में शामिल होने को लेकर खुशी जाहिर की। वह नमस्ते नाम का एक कारोबार चलाती हैं, जिसमें भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाता है। उन्होंने कहा, मैं भारतीय हस्तशिल्प से बने चमड़े के सामान, रेशमी स्कार्फ, अगरबत्तियां और इनर गारमेंट्स बेचती हूं, जो सभी भारत में बने होते हैं। कोकी ने ओडिशा को भारत का एक छिपा हुआ रत्न बताया। 

इस सम्मेलन के आयोजन से पूर्व सरकार द्वारा वह नही बताया गया कि अब तक आयोजित 17 प्रवासी सम्मेलन की उपलब्धि कया है। इसके माध्यम से देश में कितने उद्योग आए।कितनी भारतीय प्रतिभाएं स्वदेश  वापिस लौटी। हालाकि यह सर्व विदित है कि प्रवासी भारतीय  पहले के मुकाबले अब सूदूर देश में अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। वे मानते  है कि मुसीबत की घड़ी में उनका देश और वहां की सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी होगी और भरसक मदद करेगी।

इस सम्मेलन में केंद्र द्वारा  प्रवासियों से भारत के विकास में योगदान की अपील के साथ यह नही बताया गया कि वे देश  विकास का माहौल बनाने के लिए क्या कर रहा है।  हाल में एक सर्वे में दावा किया गया है कि 100 में से 66 लोगों को अपना काम  कराने के लिए सरकारी तंत्र को रिश्वत देनी पड़ती है। चलते देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने की सिंगल विंडो क्लियरेंस और ईज आफ डुइंग बिजनेस जैसे प्रयासों को पलीता लग रहा है।एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि करीब 66 प्रतिशत कंपनियों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। कंपनियों ने दावा किया कि उन्होंने सप्लायर क्वॉलीकेशन, कोटेशन, ऑर्डर प्राप्त करने तथा भुगतान के लिए रिश्वत दी है। लोकल सर्कल्स की रिपोर्ट के अनुसार कुल रिश्वत का 75 प्रतिशत कानूनी, माप- तौल, खाद्य, दवा, स्वास्थ्य आदि सरकारी विभागों के अधिकारियों को दी गई।जांच रिपोर्ट कहती है कि कई कारोबारियों ने जीएसटी अधिकारियों, प्रदूषण विभाग, नगर निगम और बिजली विभाग को रिश्वत देने की भी सूचना दी है। पिछले 12 महीनों में जिन कंपनियों ने रिश्वत दी, उनमें से 54 प्रतिशत को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जबकि 46 प्रतिशत ने समय पर काम पूरा करने के लिए भुगतान किया। इस तरह की रिश्वत जबरन वसूली के बराबर है।केंद्र सरकार को  इस रिपोर्ट के बारे  टिप्पणी करनी चाहिए थी। यह भी बताना चाहिए था कि इस भ्रष्टाचार के नाम पर इस जबरन वसूली रोकने की इसकी क्या योजनांए है?देश में उद्योग लगाने के लिए माहौल बनाने के लिए उसकी क्या तैयारी हैं?

अशोक मधुप

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, January 8, 2025

आदमी अब घर से बाहर क्या खाएं?

आदमी अब घर से बाहर क्या खाएं? अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार हाल में खबर आई है कि आगरा में 18 प्रसिद्ध और बड़ी कंपनियों के नाम से नकली घी तैयार हो रहा था। तैयार घी की पूरे यूपी समेत कई प्रदेशों में सप्लाई होती थी।इस घी से बाजार में फास्ट फूड तैयार होते हैं।पहले भी समय –समय पर नकली घी पकड़ा जाता रहा है। बाजार में पनीर, दूध, मावा और अन्य खाद्य पदार्थ के नकली होने की शिकायतें मिलती रहती हैं।आटा,दाल और अन्य खाद्य सामन भी घटिया क्वालिटी का पकड़ा जाता रहा है।पिछले कुछ समय से खाने या पानी में थूकने, पेशाब करने , खाने के बर्तन को नाली के पानी में धोने की शिकायते रहीं हैं। ऐसे में प्रश्न पैदा होता है कि आदमी घर से बाहर अब क्या खाएं? सफर में पेट भरने के लिए आदमी क्या करे? क्या हमें पुरानी स्थिति पर जाना होगा, जब आदमी घर से ही खाना लेकर चलता था। घर का खाना खत्म होने पर फल खाकर काम चलाता था, किंतु बाजार का नही खाता था। या अब उसे घर से बड़ी कंपनियों के रेटीमेड फूट पैकेट लेकर चलने होंगे? आगरा के ताजगंज के मारुति सिटी रोड पर नवविकसित कॉलोनी के प्लॉट में नकली देसी घी तैयार करके पूरे प्रदेश में सप्लाई किया जा रहा था। पुलिस और एसओजी की टीम ने छापा मारकर अमूल, मधुसूदन, पतंजलि सहित 18 मशहूर ब्रांडों के नाम की पैकिंग में नकली देसी घी जब्त किया है। इसमें रिफाइंड व अन्य कैमिकल की मिलावट की जा रही थी। फैक्टरी के मैनेजर सहित पांच लोग गिरफ्तार किए हैं। डीसीपी सिटी सूरज कुमार राय ने बताया कि मारुति सिटी रोड पर मारुति प्रभासम कॉलोनी में राजेश अग्रवाल नामक व्यक्ति के प्लॉट में टिन शेड डालकर फैक्टरी संचालित की जा रही थी। प्लॉट किराए पर ले रखा था। पूछताछ में बताया गया कि ग्वालियर निवासी बृजेश अग्रवाल, पंकज अग्रवाल, नीरज अग्रवाल का प्योर इट के नाम से देसी घी का ब्रांड है। उन्होंने करीब छह माह पूर्व फैक्टरी खोली थी। कॉलोनी के राजेश भारद्वाज को मैनेजर बनाया था। बाजार से जिस ब्रांड की डिमांड मिलती थी, उसी ब्रांड के स्टिकर लगाकर टिन और डिब्बों में पैक कर दिया जाता था। प्रेस को यह भी बताया गया कि फैक्टरी में भारी मात्रा में बना हुआ घी, कच्चा माल, कई कंपनियों के स्टीकर, प्रयोग की जाने वालीं मशीन, पैकिंग मशीन आदि बरामद की गई हैं। बरामद माल की कीमत करोड़ों में बताई जा रही है। पुलिस फैक्टरी के संचालक और कर्मचारियों के विरुद्ध अपनी तरफ से मुकदमा दर्ज कर रही है। एफएसडीए की टीम को भी कार्रवाई के लिए बुलाया गया है। आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। पुलिस ने बताया कि छापे से कुछ देर पहले ही नकली देसी घी के 50 टिन की खेप मेरठ भेजी गई थी। इस माल की बरामदगी के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस ने बताया कि नकली देसी घी प्रदेश के अलावा आसपास के राज्यों में सप्लाई किया जा रहा था। पॉम आयल, रिफाइंड, वनस्पति और एसेंस से तैयार हो रहा था।सुगंध असली घी जैसी और दाने भी रवेदार, एकबारगी तो पुलिस टीम को भी असली घी का भ्रम हुआ। डीसीपी सिटी सूरज कुमार राय ने बताया कि वह खुद मौके पर पहुंचे। सबसे पहला सवाल यह किया कि घी कैसे बनाते थे। आरोपियों ने बताया कि देसी घी की लोगों को पहचान नहीं है। कोई खुशबू देखता है तो कोई दाने। वो लोग पॉम ऑयल, रिफाइंड, वनस्पति घी, कैमिकल को मिलाकर देसी घी तैयार किया करते थे। उसमें एसेंस मिलाते थे। ताकि खुशबू आए। मौके से एक्सपाइरी डेट का रिफाइंड भी मिला। पुलिस ने आरोपियों से पूछा कि इसको क्यों खरीदा। मजदूरों ने बताया कि एक्सपाइरी डेट का माल सस्ता मिलता है। जब वे देसी घी बनाते थे तो इस रिफाइंड का भी प्रयोग करते थे। आगरा पुलिस के अनुसार बिल्टियों की जांच में पता चला कि नकली देसी घी को राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, असम व बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश के दो दर्जन से ज्यादा शहरों के फास्ट फूड बाजारों में सीधे बेचा जाता था। इसी घी से डोसा, भल्ले, समोसे और आमलेट तक बनाया जाता था। खाद्य और औषधि विभाग ग्वालियर के अनुसार रामनाथ अग्रवाल व उनके परिवार के लोग पहले नकली घी के कारोबार में लिप्त थे और रासुका भी लगी थी।2010 के बाद से इन्होंने ग्वालियर छोड़ दिया था। इससे पहले 24 नवंबर 2023 को दिल्ली पुलिस ने द्वारका में एक ऐसी फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है, जहां मिलावटी घी बनाया जाता था और उसे पतंजलि, मदर डेयरी और अमूल जैसे ब्रांड का स्टिकर लगे हुए कंटेनर में भरकर बेचा जाता था। बाबा रामदेव की नामी-गिरामी कंपनी पतंजलि ब्रांड गाय के घी का सैंपल खाद्य सुरक्षा और औषधि विभाग के द्वारा साल 2021 में दीपावली के पर्व पर टिहरी जनपद के घनसाली में एक दुकान से सैंपल भरा गया था। इसके बाद सैंपल को राज्य की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया तो, सैंपल फेल पाया गया। खाद्य संरक्षा विभाग के द्वारा कंपनी को नोटिस जारी किया तो, कंपनी ने राज्य की लैबोरेट्री को रिपोर्ट को गलत साबित किया। खाद्य संरक्षा विभाग के द्वारा केंद्रीय प्रयोगशाला में सैंपल भेजा गया तो केंद्रीय प्रयोगशाला में भी बाबा रामदेव की पतंजलि ब्रांड गाय के घी का सैंपल फेल पाया गया। आज लोगों का घर से निकलना, घूमना, यात्र करना, विभागीय कार्य से बाहर जाना आम बात है।इन लोगों को ऐसे में घर से बाहर ढ़ाबों, होटल और फाष्ट फूड सैंटर से ही पेट भरना होता है। बाजार में नकली दूध पनीर की पहले ही शिकायत रही हैं।अन्य खाद्य पदार्थ की भी शुद्धताकी कोई गारंटी नही। बिजनौर जनपद के चांदपुर क्षेत्र में पिछले साल नवरात्रि के अवसर पर बाजार में बिक रहे घटिया क्वालिटी का कोटू का आटा का खाकर काफी व्यक्ति पहले ही बीमार पड़ चुकें हैं। पिछले एक डेढ़ वर्ष से शिकायत मिल रही हैं कि कुछ लोग खाने में थूक रहे हैं। फलों पर पेशाब डालकर छिड़क रहे हैं।ब्रेड में थूका जा रहा है। खाने की सामग्री अपवित्र कर बेची जा रही है। मानव की फितरत रही है कम पैसा लगाकर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना। उसे इससे कोई मतलब नही कि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य सामग्री खाने से खाने वाले पर क्या असर पड़ेगा। नकली सामान तैयार करने वालों को इससे कोई लेना − देना नही कि उनके द्वारा तैयार नकली और निम्न क्वालिटी के सामान के प्रयोग करने वाला बीमार होगा या नही ।क्या असर होगा। वह मरेगा या जिएगा। इसे मिलावट को रोकने के लिए सरकार का आगे आना होगा। मिलावट करने वालों के खिलाफ कड़ी और आजीवन कारावास जैसी सजा, संपत्ति की जब्ती जैसी कार्रवाई अमल में लानी होगी।भोजन को अशुद्ध करने के मामले में धर्म गुरूओं को आगे आकर जनचेतना पैदा करनी होगी। यदि ऐसा न हुआ तो हो सकता है, कि आने वाले समय में आदमी आज से 100 साल पीछे की हालत में चला जाए।यह घर से खाना और सफर में तैयार किए जाने वाले खाने का सामान लेकर चलता । इस सामान के खत्म होने पर यह विवशता में फल आदि खाकर काम चलाता था, किंतु बाजार का कुछ नही खाता था। यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में सफर पर जाने वाला अपने साथ बड़ी कंपनी की तैयार खाद्य सामग्री लेकर चले और सफर में उसी से उदर पूर्ति करे। अशोक मधुप ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, December 20, 2024

कुछ भी कहो, सरकारी तंत्र में नही घटा भ्रष्टाचार

 

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की सरकारे कितना  ही भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दावा करें किंतु सच्चाई इसके वितरीत है। एक सर्वे में दावा किया गया है कि 100 में से 66 लोगों को अपना काम  कराने के लिए सरकारी तंत्र को रिश्वत देनी पड़ती है किंतु सच्चाई इसके विपरीत है। शायद ही कोई विभाग ऐसा होगा जहां बिना   रिश्वत दिए काम हो जाए।सब जगह हालत बहुत खराब है।गैर भाजपा राज्यों की तरह भाजपा  शासित राज्यों में भी  प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचर का बोलबाला है। सरकारें मौन हैं।

देश में केंद्र और राज्य सरकारें कारोबार में सहूलियत और निजी क्षेत्र के निवेश में तेजी लाने पर जोर दे रहीं हैं। वहीं भ्रष्ट सरकारी मशीनरी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कंपनियों और उद्यमियों से अवैध तरीके से पैसे उगाहने में लगी हैंजिसके चलते देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने की सिंगल विंडो क्लियरेंस और ईज आफ डुइंग बिजनेस जैसे प्रयासों को पलीता लग रहा है।एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि करीब 66 प्रतिशत कंपनियों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। कंपनियों ने दावा किया कि उन्होंने सप्लायर क्वॉलीकेशनकोटेशनऑर्डर प्राप्त करने तथा भुगतान के लिए रिश्वत दी है। लोकल सर्कल्स की रिपोर्ट के अनुसार कुल रिश्वत का 75 प्रतिशत कानूनीमाप- तौलखाद्यदवास्वास्थ्य आदि सरकारी विभागों के अधिकारियों को दी गई।

जांच रिपोर्ट कहती है कि कई कारोबारियों ने जीएसटी अधिकारियोंप्रदूषण विभागनगर निगम और बिजली विभाग को रिश्वत देने की भी सूचना दी है। पिछले 12 महीनों में जिन कंपनियों ने रिश्वत दीउनमें से 54 प्रतिशत को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गयाजबकि 46 प्रतिशत ने समय पर काम पूरा करने के लिए भुगतान किया। इस तरह की रिश्वत जबरन वसूली के बराबर है।

सरकारी एजेंसियों के साथ काम करते समय कंपनियों के काम जान बूझ कर रोके जाते हैं और रिश्वत लेने के बाद ही फाइल को मंजूरी दी जाती है। सीसीटीवी कैमरों लगाने से सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। सर्वे में दावा किया गया है कि सीसीटीवी से दूरबंद दरवाजों के पीछे रिश्वत दी जाती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट मार्केटप्लेस जैसी पहल भ्रष्टाचार को कम करने के लिए अच्छे कदम हैंलेकिन सरकारी विभागों में रिश्वत लेने के रास्ते खुले हुए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर डेलायट इंडिया के पार्टनर आकाश शर्मा ने कहना है कि बहुत सी कंपनियों को लगता है कि नीतियों और प्रक्रिया के मामलों में थोड़ा पैसा देते रहने नियम कानून के मोर्चे पर कड़ी जांच पड़ताल और जुर्माने से बच जाएंगे। सर्वे में 18,000 कारोबारियों के जवाब को शामिल किया गया है। सर्वे देश के 159 जिलों में हुआ है।

व्यवसायों ने पिछले 12 महीनों में आपूर्तिकर्ता के रूप में अर्हता प्राप्त करनेकोटेशन और ऑर्डर सुरक्षित करने तथा भुगतान एकत्र करने के लिए विभिन्न प्रकार की संस्थाओं को रिश्वत देने की बात स्वीकार की है। यह सर्वेक्षण 22 मई से 30 नवंबर 2024 के बीच किया गया था। सर्वेक्षण में भाग लेने वाली व्यावसायिक फर्मों ने कहा कि 75 प्रतिशत रिश्वत कानूनीमेट्रोलॉजीखाद्यऔषधिस्वास्थ्य आदि विभागों के अधिकारियों को दी गई।

 सरकारी विभागों को घूस देने वाले कारोबारियों का प्रतिशत इस प्रकार है। कानूनीमाप तौलखाद्यदवा और स्वास्थ्य विभाग- 75,लेबर और पीएफ विभाग- 69,संपत्ति और भूमि पंजीकरण – 68,जीएसटी अधिकारी- 62,प्रदूषण विभाग- 59,नगर निगम- 57,इनकम टैक्स- 47,अग्नि शमन- 45,पुलिस- 43,परिवहन- 42,बिजली- 41,आबकारी- 38

ये आंकड़े कुछ भी हों, सच्चाई इससे भी बदतर है। ये बड़े स्तर की बात है।स्थानीय स्तर पर तो हालत इससे भी खराब है।भाजपा शासित प्रदेश वाले राज्यों में तो सपा −बसपा शासन काल में जहां गलत काम एक हजार रूपये में हो जाता था, अब भाजपा शासन में गलत काम तो होता ही नही ,सही काम  कराने के भी एक हजार की जगह बीस हजार रूपये दिए जाते हैं।बिजली के कनेक्शन के लिए आवेदन करिये। ये बहुत छोटा काम है, किंतु बिजली इंस्पैक्टर को रिश्वत दिए कनेक्शन स्वीकृत नही होगा।बिजली की फीटिंग किसी से भी कराएं किंतु बिजली विभाग के अधिकृत ठेकेदार से बिजली फीटिंग का प्रमाणापत्र लेना होता है। यही ठेकेदार बिजली इंस्पैक्टर का भाग भी आपसे ले लेता है। रजिस्ट्रार आफिस में धड़ल्ले से बैनामे  की राशि का दो प्रतिशत वसूला जाता है। यह राशि अधिकारी सीधे नही लेते । बैनामा लिखने वाला कातिब लेता है। शाम को बैठकर आराम से दिन भर का लेन −देन हो जाता है।एनओसी देने वाले विभागों की तो हालत और भी खराब है। फायर विभाग के अधिकारियों ने तो  अपने ठेकेदार रख लिए हैं। अग्नि सुरक्षा का सारा काम ये ही कराते हैं।इसके बाद भी एनओसी साइन करने के लिए लाखों रूपया वसूला जाता है। और तो और अग्निशमन अधिकारी एनओसी देने से पहले फायर उपकरण  अपने चहेते ठेकेदार से सप्लाई कराते हैं। स्थानीय  निकाय में निर्माण  कार्यों में 45 से 55 प्रतिशत सरे आम कमीशन लिया जा रहा है।

केंद्र और प्रदेश सरकार के आदेश हैं कि सरकारी खरीद जेम पार्टल से हो।इसका भी  रास्ता निकल गया।  कंपनी के एजेंट अधिकारियों से मिलते हैं। कमीशन तै होता है। अधिकारी अपना जैम पोर्टल का पासवर्ड

कंपनी के एजेंट को बता देते हैं। एजेंट पासवर्ड   लेकर जैम पार्टल से ही अपनी फर्म से खरीदारी करता है। सामान के रेट में अधिकारियों का कमीशन जुड़ जाता है।सब वैसे ही चल रहा है। कहीं कुछ नही बदला। सरकार  भ्रष्टाचार रोकने को आदेश  बाद में करती है । अधिकारी और सप्लायर रास्ता  पहले निकाल लेतें हैं। उत्तर प्रदेश में आदेश  हो गए कि सामन प्रदेश स्तर से खरीदा जाएगा।  अब काम और भी   सरल हो गया। पहले जिलों में अधिकारियों से संपर्क  कर माल सप्लाई होता था। अब अकेले प्रदेश स्तर में ही जुगाड़ करना  पड़ता है।इसी का कारण है कि जिलों के अस्पतालों में वितरण के लिए वे  दवाई आती हैं, जिनकी एक्सपायर डेट नजदीक होती है। दवा आने के साथ ही आदेश  आते हैं कि दवा की एक्सपायर डेट नजदीक है।जल्दी बांटकर दवा खत्म करो।सरकारी अस्पतालों में मरीजों को घटिया क्वालिटी  के भेजन वितरण की शिकायत आम बात हैं किंतु कुछ होता  नहीं।

लेखक एक दिन दूधिए से बात कर रहा था।लेखक ने दूधिए से पूछा कि किसी को कुछ देना तो  नही पड़ता।  उसने कहा कि तीन इंस्पैक्टर हैं। दो प्रतिमाह 1500− 1500 रूपये लेते हैं। और तीसरा दो हजार। मैंने पूछा कितने दूधिए हैं।  उसनें कहा कि बिजनौर जैसे छोटे  शहर में तीन हजार दूधिए दूध सप्लाई करते हैं।पास्पोर्ट के आवेदन के वेरीफिकेशन के लिए पुलिस और एलआइयू में जाकर देखिए।ऐसे ही पुलिस में चरित्र की जांच के लिए जाइए। बिना लिए −दिए कुछ नही होगा।

भ्रषटाचार की इससे बड़ी सीमा क्या होगी, कि अधिकारियों ने राइफल एसोसिएशन के नाम पर शास्त्रों के लांइसैंस बनाने पर 10 से 30 हजार रूपये तक कुछ जगह वसूलने शुरू कर दिए।शस्त्र  नवीनीकरण  पर तो शुल्क एसोसिएशन शुल्क लंबे समय से लिया जा रहा है । इस एसोसिएशन में जमा धन  का न कोई हिसाब है न ही कोई आडिट। ऐसे ही जनपद के नाम पर कल्याण समिति बना ली ।हैसियत और वारिसैन बनवाने आने वालों  से बड़ी रकम वसूलनी शुरू कर दी।ये रकम     

अधिकारियों के ऐश− और आराम पर खर्च होने लगी।अधिकारियों की कोठी में थोक में एयर कंडीशन  लगने लगे। कोठियों की राजाओं जैसी सजावट होने लगी।  अलग− अलग जगह अलग −अलग तरह के रास्ते निकाल लिए।

पुराने लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचर ऊपर    से नीचे जाता है, किंतु अब ऐसा नही है। अब  ऊपर की न शिकायते मिलती हैं न चर्चाएं किंतु नीचे तो सब और लूट के द्वार खुलें हैं। कहीं भी जाइए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Monday, November 18, 2024

पूरी तरह कामयाब रहा बिजनौर महोत्सव

 पूरी तरह कामयाब रहा बिजनौर महोत्सव

कार्यक्रम की सफलता से बहुत उत्साजहित है बिजनौरी

अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

बि‍जनौर जनपद के दो सौ  साल पूरे होने पर आयोजि‍त  बि‍जनौर महोत्सव अपनी आन -बान और शान  के साथ  संपन्न  हो गया।इसके साथ ही  बिजनौरवासियों में एक चेतना का संचार कर गया। इस कार्यक्रम में देश- विदेश से बड़ी संख्या में बिजनौरी शिरकत करने आए। बिजनौर महोत्सेव से जुड़ने वाले बिजनौरी अब अपने  जनपद के विकास की बात कर रहे हैं।जनपद के विकास की योजनाएं  बना रहे है।सबका प्रयास है कि  बिजनौर जनपद में विकास की त्रिवेणी पूरी क्षमता से प्रवाहित हो।   

बिजनौरवासियों को अबतक अफसोस रहा है कि  विकास के मामले में शुरू  से ही बिजनौर को  नजर अंदाज  किया  गया है। बिजनौर के  विकास के लिए आए प्रोजेक्टत बड़े नेता अपने क्षेत्र में ले गए।प्राय: बिजनौर का सांसद  उस दल से चुना जाता रहा ,जिसकी केंद्र में सरकार नही होती थी। सो न उसकी सुनी गई न उसके क्षेत्र में विकास ही हुआ।

बिजनौर महोत्सीव के लिए बिजनौर जिला प्रशासन ने कई माह से तैयारी शुरू कर दी थी। इसी के परिणामस्विरूप बड़ी तादाद में बिजनौरी प्र्रशासन द्वारा बनाए इस व्हावटसएप ग्रुप से जुड़े।उन्होंसने सोचना शुरू कर दिया की बिजनौर का विकास कैसे हो। बिजनौर महोत्सेव में देशभर से तो बिजनौरी कार्यक्रम में पहुंचे ही, कनाड़ा,बंगलादेश  और  दुबर्इ  आदि से भी बिजनौरी कार्यक्रम में  शिरकत करने आए। सबने   पूरे मन से कार्यक्रम का आनंद लिया। 

उद्घाटन के बाद आठ नवंबर की शाम को प्रवासी बिजनौरियों ने गंगा बैराज पर  गंगा  आरती में भाग लिया। गंगा  आरती इतनी भव्य  थी  कि देखकर  लगता था कि ये  आरती बिजनौर में नही बनारस या हरिद्वार में गंगाघाट पर हो रही हो। गंगा आरती के संयोजक सौरभ  सिंघल ने इस आरती  कराने के लिए बनारस से आठ  योग्यक पंडित बुला रखे थे।उन्होंकने आरती विधि विधान से कराई। आने वाले मेहमानों को  गंगा जल से भरी एक-एक गंगा जलहरी भी भेंट की गई। 

बिजनौर महोत्सेव में सांस्कृातिक कार्यक्रम ,  कवि सम्मे लन और मुशायरे में शामिल होने वाले प्राय:  बाहरी कलाकार और  कवि थे।इसलिए बिजनौर के युवाओं ने जनपद के कवियों के लिए सात नवंबर की रात में मुशायरा रख लिया।नौ और   इसमें जनपद के कवियों  ने कविताएं प्रस्तुरत किए।  नौ और  दस में हुउ जनपद के स्कूवली छात्र - छात्राओं अैर जनपद के कलाकारों ने कार्यक्रम प्रस्तुीत किए।इन्हेंल देखकर कोर्इ  ये नही कह सकता थी ये बड़े या मुंबई की फिल्मीय दुनिया के कलाकारों से कमतर हैं। कक्षा  सात के छात्रों के आरकेस्ट्रा ने तो  पूरे कार्यक्रम में अपनी धूम रखी।

 नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम् दर्शकों  पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया।

बिजनौर की एक सांग मंडली ने सांग प्रस्तुोत कर जनपद की पुरानी सांग खेलने की परंपरा को जिवित करने का प्रयास किया।ऐसे  ही चांदपुर के  चाहरबैत के गायकों ने अरब से आई इस गायन कला की प्रस्तु ति से दर्शर्कों का मन मोह लिया। चाहरबैत अरब से आर्इ कला है।  इसे पठानी कला के नाम से भी जाना जाता  है।  

बेसिक शिक्षा की कक्षा  सात की बालिकाओं के कार्यक्रम को देखकर सारे दर्शक वाह-वाह कर उठे। किसी को नही लगा कि यह स्था नीय बालिकाएं हैं।ऐसे ही जनपद के  सीमावृति गांव की महिलाओं  ने गढ़वाली नृत्यऐ करके अपनी प्रतिभा का दर्शकों को लोहा मनवा दिया।     


बिजनौर वासियों ने मंथन कार्यक्रम में   बिजनौर के विकास पर चर्चा की । ये भी चर्चा हुई कि बिजनौर को  पर्यटन के नक्शे   पर लाने के लिए क्याभ- क्यार किया जाए।यह भी तय हुआा कि इसके लिए बिजनौर की अलग से वेवसाइट बनाई  जाए। जनपद के संपर्क मार्ग पर प्रचार के हार्डिंग लगाए जाए।युवाओं को गाइड के लिए प्रशिक्षित किया जाए।जनपद में बढ़ते पर्यटन को देखते हुए पर्यटकों के निवास के स्‍‍थान बढाए जाएं। जनपद में होम स्टेप का प्रचलन शुरू कि‍या जाए।

वास्तरवि‍क कार्यक्रम  आठ नौ दस नवंबर को था किंतु स्कूटल और कालेज में कार्यक्रम कई  दिन पहले से शुरू हो गए थे। अधिकारिक कार्यक्रम की समाप्तिक के बाद भी स्कूएल  कालेज में कार्यक्रम अब भी जारी हैं। पूरे जनपद को सजाने में प्रशासन स्तूर से कोई  कमी नही रखी गई। जगह जगह पर  लगे होर्डिग इस कार्यक्रम केा भव्यम  बना रहे थे।  बिजनौर शहर को सजाने में तो बिजनौर पालिका ने कोई कसर ही नही छोड़ी।  

राज्यई ललित कला केंद्र की और से रानी भाग्यलवती महिला महाविद्यालय के सभागार में आयोजित  पांच दिवसीय प्रदर्शनी भी बहुत लोकप्रिय हुई। इसमें बिजनौर और प्रदेश के   चित्रकारों ने  राष्ट्री य  अस्मिहता और बिजनौर की थीम पर चित्र बनाए।इस प्रदर्शनी का जनपद के चित्रकार, कला प्रेमी और छात्र-छात्राओं ने अवलोकन किया। ये प्रदर्शनी जनपद के युवा और प्रतिभाओं का  मा्र्ग प्रश्‍स्ता करने का कार्य करेगी।

बिजनौर महोत्सनव के अवसर पर जनपद के सभी  विद्यालयों ने अपने यहा अलग अलग कार्यक्रम आयोजित करके जनरूचि  और जनभागीदारी पैदा करने का कार्य किया।     

जनपदवासियों और प्रशासन ने बाहर से आने वाले बिजनौरियों के स्वागगत में कोई  कसर नही छोड़ी।  उनका भरपूर सम्माकन किया गया।कार्यक्रम में शामिल होने वालों से प्रशासन और बिजनौरवासियों ने जिले के विकास में भरपूर सहयोग की अपील की।  आगंतुक बिजनौरी भी  मन ही मन में में ये सौंगध लेकर गए कि अपने जनपद के विकास में अब उन्हेंन योगदान करना  है। कोई  कोर कसर नही छोड़नी है।

आज हालत है कि जिले के आईएएस, पीसीएस और  बड़े अधिकारियों ने अपना -अलग ग्रुप बना लिया   है। इस ग्रुप में शामिल सभी बिजनौर के विकास पर बात कर रहे है। सबका प्रयास है कि अब तक हुई जनपद की उपेक्षा की कमी वह जल्दीह से जल्दी पूरी कर दें।  

अखबारों ने इस कार्यक्रम के कवरेज के लिए विशेष प्रबंध किए। स्थारनीय दैनिक  बिजनौर टाइम्सए और चिंगारी ने तो इस अवसर पर विशेष  परिशिष्ठी  निकाले।     

bइस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसका संदेश  दुनिया भर में बसे भारतीयों तक पंहुचा। वे सब अब बिजनौर और  उसके होने वाले विकास में अपना योगदान देने का  प्रयास कर रहे हैं। जिलाधिकारी  देवदत्ते जी के समय 1998 और 1999 में भी हालाकिं बिजनौर महोत्सव की तरह  विदुर महोत्स व हुए थे, किंतु वह एक प्रकार से सरकारी कार्यक्रम ही बनकर रह गए। उनमें जनभागीदारी नही बढ़ी। उससे  बिजनौरवासी  नही जुड़ सके। इस बार जनपद वासियोंकी भागीदारी बढ़ी। प्रशासन ने उन्हें  जगह –जगह से बुलाया।उनसे आह्वान किया कि बिजनौर आपका  जिला है।इसके विकास में आप योगदान करें। आप सब अपने जिले को आगे लाने के लिए कार्य करें।

इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि  यह है कि इस बार के कार्यक्रम में राजनैतिक व्यीक्‍तियों को अलग रखा गया।यह कार्यक्रम शुद्ध  बिजनौरवासियों का बनकर ही रहा।   इस कार्यक्रम में एक कमी लगी की  कार्यकम के दौरान बिजनौर जनपद के विकास का कोई स्प ष्टम  एजेंडा  नही बन सका।यदि ये हो जाता तो  और बेहतर होता।

इस का्र्यक्रम के आयोजन के बाद अब यह निश्चि त होता लग रहा है कि अब ये बिजनौर महोत्स व बिजनौर की भूमि पर प्रतिवर्ष हुआ करेगा। और उम्मीाद है कि आने वाले कायर्क्रमों  में प्रत्ये क वर्ष  बिजनौरवासियों की भागीदारी बढ़ेगी।इसके लिए जिला प्रशासन कार्यक्रम में आने वालों का डाटा  भी इसी लिए तैयार कर रहा है।  

अशोक मधुप

 ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

अब कनाड़ा में खालिस्तान बनने की प्रक्रिया शुरू

अशोक मधुप, वरिष्ठ  पत्रकार

अभी कुछ माह पूर्व  25 मई को हमने अपने लेख्‍ में कहा था  कि कनाडा में खालिस्‍तान समर्थकों की गतिविधि को भारत नजर अंदाज करता रहे। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को खालिस्‍तानियों का समर्थन करने दे, जल्‍दी ही खालिस्‍तान कनाडा में बने। भारत में नही। ऐसा होता अब नजर आने लगा है।खालिस्‍तानी वहां मांग करने लगे हैं कि कनाडा  हमारा है। बाकी दुनिया भर के लोग अपने-अपने देश  वापस जांए।

 कनाडा में निकाले गए एक ‘नगर कीर्तन’ के दो मिनट के वायरल वीडियो में खालिस्तान समर्थकों ने कनाडाई लोगों को ‘घुसपैठिया’ कहा।  उन्हें ‘इंग्लैंड और यूरोप वापस जाने’ के लिए कहा। वीडियो में जुलूस में शामिल लोगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है। ‘यह कनाडा है, हमारा अपना देश। तुम कनाडाई वापस जाओ.। भारतीय खुफिया सूत्रों ने इस घटना को कनाडा में  नॉर्मल करार दिया । कहा कि खालिस्तानी धीरे-धीरे देश के सभी पहलुओं पर ‘कब्जा’ कर रहे हैं। ठीक से निगरानी न होने की वजह से ये खालिस्तानी समूह स्थानीय कनाडाई लोगों से भी नियंत्रण छीन रहे हैं। हिंदुओं से सुरक्षा के लिए पैसे मांगे जा रहे हैं और अब उनकी कॉलोनियों में स्थानीय लोगों को खतरा हैं।

 कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत में खालिस्तान बनाने की मांग करने वाले अतिवादियों पर सत्‍ता संभालने के बाद से पूरी तरह मेहरबान है।भारत द्वारा इन अतिवादियों के  बारे में दी गई  जानकारी पर वे कुछ कार्रवाई  नही कर रहे,  अपितु भारत पर ही आरोप लगा रहे हैं कि भारत से फरार अपराधी खालिस्तानी अतिवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में उसके राजनयिक का हाथ है। हमने पहले लेख में  कहा था भारत को चाहिए कि यह कनाडा  के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो  को भारत के खालिस्तान का समर्थन करने वाले अतिवादियों का समर्थन करने दें। कुछ समय  ऐसा  ही चलने दें।हां सार्वजनिक रूप से भारत उसे चेतावनी  देने का सिलसिला जारी रखें। अपने यहां  खालिस्तान समर्थकों पर सख्ती रखें।कुछ समय ऐसा  ही चलता रहा तो यह निश्चित है कि अब खालिस्तान भारत में नही कनाडा में बनेगा। कनाडा की धरती पर बनेगा। हमारा  पहला कथन अब सही होता दीखने लगा है। कुछ समय ऐसा ही होता रहा तो ये खालिस्तान समर्थक कनाडा के लिए ही सिर दर्द बनेंगे। कनाडा़  ने सख्‍ती की तो ये उसके खिलाफ विद्रोह पर उतर आएंगे। 

आज जो कनाड़ा  कर रहा है, कभी वही भारत के कुछ नेताओं ने किया था।  वह पंजाब में खालिस्तान  की बढ़ती गतिविधियों  को नजर अंदाज करते रहे।परिणाम स्वरूप पंजाब में रहने वाले  हिंदुओं को पंजाब छोड़ने के लिए कहा जाने  लगा।  उन पर हमले होने  शुरू  हो गए।  सिख आंतकवाद पंजाब में ही नही बढ़ा,अपितु  उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र को भी उसने अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया।इस दौरान पंजाब में धार्मिक  नेता भिंडरावाला तेजी से लोकप्रिय हुए  ।  कहा  जाता  है कि राजनैतिक लाभ के लिए केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उसे प्रश्य देना शुरू कर दिया। हालत यह हुई  कि वहीं भिंडरावाला कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित हुआ।  उसने स्वर्ण मंदिर में डेरा जमा लिया।  मजबूरन  प्रधानमंत्री इंदिरा  गांधी को  भिंडरावाला को स्वर्ण  मंदिर से  निकालने के लिए फौज का सहारा लेना पड़ा।बाद में   प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी केही दो सिख सुरक्षा गार्ड ने उनकी हत्या कर दी।

आज जो  कनाडा में हो रहा है,  वह 40 साल से  खालिस्तान समर्थकों को पोषित किए जाने का  परिणाम है।कनाडा में खालिस्तान समर्थक आंदोलन पिछली सदी के आठवें दशक में शुरू हो गया था। पियरे ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसकी जड़ें गहरी हुईं। उनके कार्यकाल के दौरान ही तलविंदर परमार भारत में चार पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद कनाडा भाग गया था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून 1973 में कनाडा की यात्रा की थी और पियरे ट्रूडो के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध सौहार्दपूर्ण थे। लेकिन, पियरे ट्रूडो ने 1982 में तलविंदर परमार को भारत प्रत्यर्पित करने का अनुरोध ठुकरा दिया। इसके लिए बहाना बनाया गया कि भारत का रुख महारानी के प्रति पर्याप्त रूप से सम्मानजनक नहीं है।

पियरे ट्रूडो के पद छोड़ने के ठीक एक साल बाद तलविंदर परमार ने जून 1985 में एयर इंडिया की फ्लाइट 182 (कनिष्क) में बम विस्फोट की साजिश की। इसमें विमान में सवार सभी 329 लोग मारे गए। हालाकि मरने वालों मे अधिकतर कनाडा के  ही नागरिक थे।इस विमान हादसे में कुछ तो पूरे परिवार  ही  खत्म हो गए।अगर पियरे ट्रूडो ने तलविंदर परमार को भारत प्रत्यर्पित करने का इंदिरा गांधी का अनुरोध मान लिया होता, तो कनिष्क विमान में विस्फोट नहीं हुआ होता। भारतीय-कनाडाई राजनीति के जानकार   मानने लगे हैं कि जो  गलती पियरे ट्रूडो  ने तब की थी,वहीं उनके बेटे जस्टिन ट्रूडो भी आज कर रहे हैं।अपनी सरकार चलाने के लिए कनाडा में खालिस्तान समर्थक उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति रखकर वही गलती कर रहे हैं।कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत के ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाकर कनाडा में पल रहे खालिस्तानी समर्थकों को हवा दे दी है। प्रधानमंत्री के इन आरोपों के बाद कनाडा के अलग-अलग राज्यों में खालिस्तान समर्थकों ने ऐसी साजिश रचनी शुरू कर दी, जिससे वहां रह रहे न सिर्फ भारतीयों बल्कि डिप्लोमेट्स और भारतीय दूतावास के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है बल्कि  कनाडा में बसे भारतीय हिंदुओं को भी खतरा बनेगा।   रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा की जमीन पर पहले से ही खालिस्तान समर्थकों को कनाडा की सरकार प्रश्रय देती आई है। यही वजह है कि कनाडा सरकार के समर्थन के चलते भारत विरोधी गतिविधियां इस देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार चलती रहती हैं। बीते कुछ समय में खालिस्तान जनमत संग्रह के नाम पर कनाडा की सरकार न सिर्फ इन भारत विरोधी खालिस्तानियों को सुरक्षा मुहैया कराती आई है बल्कि कार्यक्रम स्थलों की भी उपलब्ध करवाती आई है।पिछले दिनों  एक शोभा  यात्रा में  पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की हत्या की झांकी निकालना भी इसी कड़ी का हिस्सा  है। जानकारों का मानना है कि जिस तरीके से कनाडा के प्रधानमंत्री ने भारत के ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाया है उसका असर अगले कुछ दिनों में ही बहुत तेजी से दिखना शुरू हो सकता है।कनाडा के प्रधानमंत्री के बयान के बाद के हालात में क्रम में सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की ओर से हिंदू समुदाय को धमकी दी गई है।  एसएफजे के पन्नू ने कनाडा के हिंदुओं को धमकी दी है । पन्नू ने उन्हें कनाडा छोड़ने के लिए कहा है। जो  पन्नू ने कनाड़ा के हिंदुओं से कहा है, ऐसा ही कभी पंजाब में आंतकवाद की शुरूआत में हिंदुओं से कहा गया था। उसके बाद  उनपर हमले शुरू हो गए थे। कनाडा में धमकी से पहले ही हिंदुओं पर हमले होने लगे हैं। 
इन धमकियों को लेकर कनाडा में भारतीय मूल के सांसद चंद्र आर्य  ने एक  न्यूज चैनल के साथ इंटरव्यू में कहा कि कनाडा में खालिस्तानी समूहों से बढ़ते खतरों के मद्देनजर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय भयभीत है।कनाडा में हिंदू लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं।दरअस्ल कनाडा में खालिस्तान समर्थकों को पाकिस्तान पाल रहा है।  कनाड़ा  इन्हें प्रश्रय  दे रहा है। अमेरिका आज के हालात में भारत का विरोध नही कर पा रहा किंतु इस मामले में  उसका भी रवैया ठीक नही है।कनाडा के हिंदुओं को  धमकी देने वाला   सिख फॉर जस्टिस (SFJ) का नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू कनेडा और अमेरिकी नागरिक है।  पन्नू भारत का फरार और इनामी आंतकी है।इसके बावजूद वह अमेरिका में सरे आम रह रहा है।

भारत को चाहिए कि वह भारत में खालिस्तान समर्थकों के प्रति सख्ती जारी रहे। कनाडा  में भारत के खिलाफ  कार्रवाई  करने वालों पर मुकदमें दर्ज करने के साथ उनके आईओसी कार्ड जब्त करता  रहे।इनकी भारत की संपत्ति भी कब्जे में ले।आज कनाडा जो  कर रहा है, कल उसके ही सामने आएगा।खालिस्तान समर्थक वहां रहने वाले हिंदू और अन्‍य कनाडा निवासियों पर हमले करेंगे।कानून व्यवस्था कनाडा की खराब होगी।  मजबूरन  जब  कनाडा सरकार सख्ती करेगी तो ये  खालिस्तान समर्थक कनाडा के निवासी  भिंडरावाला  की तरह उसी के सामने संकट खड़ा  करेंगे। 

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)