Wednesday, June 17, 2015

१८५७ की आजादी की लडा ई और बिजनौर

                १८५७ की आजादी की लड़ाई पर अमर उजाला में छपा मेरा एक पुराना  लेख

Tuesday, June 16, 2015

धर्म के नाम पर पशु क्रुरता

                                      अमर उजाला में एक सितम्बर २००० को धर्म के नाम पर हो
                                          रही पशु क्रुरता  पर छपा मेरा एक लेख

बिजनौर जनपद में कपास उत्पादन की जगह गन्ने ने ली

                               अमर उजाला में सात फरवरी २००० में बिजनोर जनपद की खेती के
                                 बदलाव पर छापा मेरा एक लेख

Sunday, June 14, 2015

दानिश जावेद स्क्रिप्ट राइटर




                           
                              अमर उजाला मेरठ के १४ जून के अंक  में प्रकाशित मेरा एक लेख। 

Friday, February 20, 2015

बिजनौर का फिल्म इडस्ट्री में योगदान


२६ अप्रैल २०१२ में अमर उजाला में बिजनौर   का फिल्म इडस्ट्री में योगदा न पर प्रकाशित मेरा लेख



Monday, December 15, 2014

तेहरवी का रिहर्सल

        सरदार तारा सिंह को जन्म दिन पर शाल ओढ़ाकर 
सम्मानित  करते श्री जय नारायण अरुण 

नूरपुर के रहने वाले सरदार तारा सिंह बहुत ही मस्त मौला है। खालसा इंटर कॉलेज नूरपुर के प्रधानाचार्य  होने के दौरान कई  बार कार्यक्रम में उन्हें संचालन करते देखा। कार्यक्रम संचालन में वे हसीं की फुलझड़ी छोड़ते रहते। सबसे बड़ी बात यह होती कि सरदार होते भी वे सरदारोंं पर ही सबसे ज्यादा चुटकुले  सुनाते । 1933 में जन्में सरदार तारा सिंह बहुत ही मस्त व्यक्ति हैं।
प्रधानाचार्य  होते राष्ट्र पति द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। उनके प्रधानाचार्य  होने के दौरान मैं नूरपुर जाता तो खालसा इंटर कॉलेज में जरूर जाता। स्कूल का समय होता या अवकाश का दिन वे कॉलेज में जरूर मिलते। मेरी कोशिश होती कि कॉलेज घूमूं  और देखूं कि नया क्या बना है। प्रत्येक बार कुछ न कुुछ नया जरूर होता। तारा सिंह ने इस कॉलेज को बुलंदी तक पंहुचाने में कोई  कसर नहीं छोड़ी।
मैने एक बार उनसे पढऩे के लिए सिखों का इतिहास मंगा लिया। बताता चलूं कि तारा सिंह की अपनी बहुत अच्छी लाइबे्ररी है। बहुत दुर्लभ  पुस्तकें उनके पास हैं। लगभग एक माह बाद आए और पूछा कि पुस्तक पढ़ली। मैंने उन्हीं कि भाषा में जवाब दिया कि देखिए पहला बेवकूफ  वह जो किसी को किताब पढऩे को दे और दूसरा वह जो पढ़कर लौटा दे। अब आप बन गए। मैं तो बनने से रहा। वे बिजनौर जब आते तो मेरे से मिलने आते और किताब मांगते नहीं चूकते। मेरा रटारटाया पुराना उत्तर सुनकर वह चले जाते। कई बार ऐसा हुआ।  एक बार आए और बातों में लग गए। उन्होंने किताब नही मांगी और विदा लेकर चलने लगे। मैंने उन्हें रोका । मेज की दराज से किताब निकालर उन्हें दें दी। किताब काफी पहले पढ़कर मेज की दराज में रख्र छोड़ी थी कि उस दिन दूंगा जिस दिन वह नहीं मांगेंगे। 
काफी दिनों बाद अभी तीन दिन पूर्व फोन आया । बोले कल में अपनी तेहरवीं का रिहर्सल कर रहा हूं। दुपहर में खाना है। जरूर आना। फिर बोले आओगे तो कुछ गिफ्ट  तो लाओगे ही। सौ  ग्राम मूंगफली जरूर लाना। 
सवेरे मैंने दफ्तर के एक साथी से कहा कि अच्छी वाली ढाई  सो ग्राम मूंगफली खरीद कर कहीं से बहुत सुंदर पैक कराकर लाओ। दफ्तर के और साथियों ने भी मेरी बात सुनी। कहा कुछ नहीं मुस्काराकर चुप हो गए। साथी बहुत सुंदर पैंकिग बनवाकर लाया। 
तारा सिंह जी के बेटे ने नूरपुर धामपुर मार्ग  पर एक कॉलेज चलाया हुआ है। तारा सिंह जी भी प्राय: वहीं मिलतें है।  मेरी गाड़ी ने कॉलेज में  प्रवेश किया तो सरदार जी सामने ही खड़े नजर आ गए। तपाक से गले मिले। बताया कौन -कौन आ गए हैं। मै  पहली बार कॉलेज में आया था , सो उन्होंने पूरा  कॉलेज घुमाया।   कॉलेज के दोनों साइड की बिल्डिंग के बीच खाली जगह पर टीन का शेड डालकर असेंबली के लिए जगह बनाई  हुई थी। लॉन बहुत ही खूबसूरत था। कॉलेज से सटाकर तारा सिंह जी ने मैरिज हाउस बनाया है।  इस पर काम चल रहा है। यहीं भोजन की व्यवस्था थी।  रास्ते में वे बतातें रहे । मै  सुनता रहा। बहुत दिन से उन्हें सुना नही था।
इस दौरान कुछ उनके शिष्य भी मिले । पांव छूकर जन्म दिन की बधाई दी। वे सबसे हंसकर  कहते -बधाई- वधाई गई भाड़ में ये बता गिफ्ट क्या लाया है? सरकार जी के विनोदी रवैये से परिचित सब कार्यक्रम का आनन्द लेते रहे। मुझे जल्दी लौटना था , सो खाना खाकर कॉलेज से सरकने लगा।
तारा सिंह मुझे अपनी पुस्तक  मंथन रास्ते में लिए मिले। पूरे पूछने पर बोले मंथन  कविताओंं की किताब है। मैने कहा मेरी कहां है? उत्तर दिया - ये अरूण जी के लिए है। अरूण जी  उनके शिक्षक  जगत के पुराने साथी  और देश के जाने माने आर्य समाजी नेता हैं। इतने में एक ने संदेश दिया अरूण जी को फीना जाना था। दूसरे रास्ते से निकल गए। अब सरदार जी ने पुस्तक पर मेरा नाम लिखकर मुझे दे दी  और मैं  बिजनौर के लिए रवाना हो गया।  पुस्तक अरुण जी को नही मुझे मिलनी थी। मुझे ही मिली जबकि तारासिंह अरूण  जी को देना चाहते थे।
  

Friday, November 28, 2014

एक गलती ऐसी भी


कई बार बहुत अजीब होता है। नया होता है। ऐसा होता है कि मन ही मन मुस्कराकर रह जाना पड़ता है।
दुबई  की  सवेरे की फलाइट थी। बिजनौर से चल कर रात को बिटिया के पास गाजियाबाद  रूका। छोटे बेटे को मुझे छोडऩे एयरपोर्ट  जाना था,सो वह भी लक्ष्मी नगर से गाजियाबाद आ गया।
दामाद को शुगर हुई थी । उन्होंने उसकी जांच के लिए मशीन खरीद  रखी थी। मेरी भी जांच करने की जिद करने लगे । मैने बहुत मना किया कि मुझे शुगर नहीं है। किंतु नहीं माने जांच की तो 265 आई।
उन्होंने कहा -आपको शुगर है। जांच कराओ । बेटा भी दबाव देने लगा। मुझे सुबह निकलना था सो मामला उस समय टल गया ।
दुबई  से वापसी आया तो परिवार का  दवाब कि जांच कराओ। छोटे बेटे- बिटिया और दामाद की टोका टाकी। मजबूरन जांच कराने को तैयार हुआ। सवेरे बिना कुछ खाए और नाश्ते के बाद दो बार जांच होती है। चलते समय मै  पत्नी को भी ले गया और कहा जांच करा लो।
जांच में फास्टिंग में 60 से 110 नार्मल है किंतु मेरी शुगर 300 आई। नाश्ते के बाद 60 से 140 होनी चााहिए । ये 412 रही। ऐयी ही कुछ हालत पत्नी निर्मल की भी हुई। 60 से 110 की जगह 200 और नाश्ते के बाद की 80 से 140 की जगह 260 हुई। हम दोनों को पहले  कभी शुगर थी नहीं , तो रिपोर्ट  पर यकीन नहीं हुआ। दूसरी लेब पर जांच कराई तो मेरी शुगर फास्टिंग  की  60- 110 की जगह 210 और नाश्ते के दो घंटे बाद की 336 रहीं। निर्मल की भी 230 और 300 रही।
बहुत बड़ी गलती यह हुई कि दूसरे दिन जांच कराने के दो दिन बाद दीपावली थी। अब शुगर निकल आई  तो मिठाई से बचना था। सो दीपावली की आई मिठाई खाने की जगर्ह बांटनी पड़ी। चाय भी फीकी शुरू कर दी। निर्मल पहले ही मीठा बहुत कम लेती हैँ, सो उन्हें तो कुछ परेशानी नहीं हुई। परेशानी मुझे हुई जिसे   मिठाई का बहुत शौक रहा है। फीकी चाया पीनी पड़ती तो यह लगता कि इससे तो न पी जाए तो ज्यादा बेहतर रहे।
किसी तरह एक माह काटा। इस दौरान हम दोनों ने परहेज किया और एक्सरसाइज बढ़ाई। पहले मुझे तीस चालिस मिनट घूमते भी परेशानी होती थी । नींद आने लगती थी। सो बींच में ही घूमना छोड़ आकर सो जाता था। अब शुगर के डर से सवेरे एक घंटा घूमना शुरू कर दिया। एक घंटा योगा प्राणायाम में देने लगा। शाम को भी खाना खाने से पूर्व  तीस चालिस मिनट घूमने  लगा।
 डाक्टर नीरज चौधरी  जनपद के बहुत बड़े फीजिशियन  और हार्ट स्पेशलिस्ट हैं। उनसे समय लिया। हमारी रिपोर्ट देखकर यह चौंके। उन्होंने अपने यहां शुगर टैस्टï कराई । निर्मल की 165 और मेरी 148 आई। फिर भी लैब पर सघन जांच कराने का निर्णय लिया गया।
अब जांच में  60 से 110 रहने वाली मेरी  शुगर 112 और निर्मल की 148 आई। रिपोर्ट  देखकर वह चौकें। बोले आपने बहुत कंट्रोल किया है। ऐसे ही बनाए रखो। दवाई की कोई  जरूरत नहीं।
अब हम अपनी बेवकूफी पर हंसते है कि दीपावली के बाद जांच  कराई  होती तो घर आई मिठाई  जमकर खाई  जाती।  इधर उधर बांटनी तो  न पड़ती। दूसरी ओर  ये सोचतें हैं कि शुगर आएगी, ये यकीन नहीं था। इसी गफलत में जांच करा ली। हां एक माह की  एकसरसाइज का परिणाम यह हुआ कि अब घूमते सुस्ती नहीं आती। थकान नहीं होती। घूमने का समय भी बढ़कर दो घंटे के आसपास आ गया है। अब को शिश है कि इसे बनाए रखा जाए।अब शुगर तो सही हो गई पर जिन्हे बता दिया कि शुगर है । चाय फीकी लेंगें अब उनसे कैसे कहा जाए । कि अब ठीक हैं मीठी चाय देना ।
अशोक मधुप