प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने हाल में गंगा एक्सप्रेस− वे और दिल्ली− देहरादून एक्सप्रेस− वे का
उद्घाटन किया। ये एक्यप्रेस−वे भारत के विकास के नए द्वार हैं। भारत की धरती पर आज
कंक्रीट और कोलतार के जो आधुनिक गलियारे बिछ रहे हैं, वे केवल सड़क मात्र
नहीं हैं, बल्कि
एक महत्वाकांक्षी राष्ट्र की धमनियां हैं। एक्सप्रेस-वे का निर्माण इक्कीसवीं सदी
के भारत की वह पहचान है जो समय और दूरी को बौना साबित कर रही है। लेकिन इस भौतिक
प्रगति के समानांतर एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि हम जितनी तेजी से रफ्तार के
बुनियादी ढांचे तैयार कर रहे हैं, उतनी
ही तेजी से हम सड़क अनुशासन के मोर्चे पर पिछड़ते जा रहे हैं। एक्सप्रेस-वे बनाना
तो इंजीनियरिंग का कमाल है, लेकिन
उन पर सुरक्षित तरीके से चलना सिखाना एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है। यदि
हम केवल पत्थर और डामर बिछाते रहे और नागरिक बोध को विकसित करना भूल गए, तो ये शानदार मार्ग
विकास के पथ नहीं, बल्कि
काल के गाल बन जाएंगे।
सड़क हादसों
के आंकड़े आज किसी महामारी से कम डरावने नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों और विभिन्न
रिपोर्टों के अनुसार, भारत
में हर साल लगभग 1.5 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं।
इसका अर्थ यह है कि हर घंटे लगभग 17 से 20 मौतें सड़कों पर हो रही हैं।
एक्सप्रेस-वे पर होने वाली दुर्घटनाओं की प्रकृति और भी भयावह है क्योंकि यहाँ
वाहनों की गति सामान्य सड़कों से कहीं अधिक होती है। तीव्र गति पर होने वाली एक
छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित होती है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, एक्सप्रेस-वे पर
होने वाली 70 प्रतिशत से अधिक दुर्घटनाओं का कारण 'ओवरस्पीडिंग' यानी निर्धारित सीमा
से अधिक गति से वाहन चलाना है। इसके अलावा,
गलत दिशा में वाहन चलाना और अचानक लेन बदलना ऐसे कारण हैं
जिन्होंने इन आधुनिक मार्गों को असुरक्षित बना दिया है। एक्सप्रेसवे पर केवल
अधिकतम गति ही नहीं, बल्कि
न्यूनतम गति का पालन भी जरूरी है। धीमी गति से चल रहे वाहन तेज़ रफ्तार वाहनों के
लिए अवरोध बन जाते हैं, जिससे
टक्कर की संभावना बढ़ जाती है। एक्सप्रेस-वे पर चलने की संस्कृति विकसित करने के
लिए सबसे पहले 'लेन
अनुशासन' को
समझना अनिवार्य है। हमारे देश में एक आम धारणा है कि सड़क का हर कोना हमारा है, लेकिन एक्सप्रेस-वे
इस मानसिकता की अनुमति नहीं देता। यहाँ सबसे बाईं ओर की लेन भारी वाहनों और धीमी
गति के लिए होती है, जबकि
सबसे दाहिनी लेन केवल 'ओवरटेकिंग' के लिए आरक्षित होती
है। अक्सर देखा जाता है कि लोग दाहिनी लेन को ही अपनी स्थायी जगह मान लेते हैं, जिससे पीछे से आने
वाले तेज रफ्तार वाहनों को रास्ता नहीं मिलता और वे मजबूरन गलत दिशा से ओवरटेक
करने की कोशिश करते हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर मौत को आमंत्रण देने जैसी है।
लोगों को यह सिखाना होगा कि ओवरटेक करने के बाद वापस अपनी निर्धारित लेन में आना
तकनीकी जरूरत ही नहीं, बल्कि
जीवन बचाने की शर्त है।
हाल ही में
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क सुरक्षा और दुर्घटनाओं को लेकर अत्यंत गंभीर
टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तेज गति से वाहन चलाना केवल यातायात
नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि
यह दूसरों के जीवन के अधिकार का हनन भी है। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में
जोर दिया है कि सड़कों की डिजाइनिंग में खामियों को दूर करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है
नियमों का सख्ती से पालन कराना। न्यायालय ने राज्य सरकारों और सड़क प्राधिकरणों को
निर्देश दिया है कि एक्सप्रेस-वे पर 'ब्लैक
स्पॉट्स' (जहां
बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं) की पहचान की जाए और उन्हें तुरंत सुधारा जाए। कोर्ट
का यह रुख स्पष्ट करता है कि अब प्रशासन केवल चालान काटकर अपनी जिम्मेदारी से
पल्ला नहीं झाड़ सकता, उसे
सुरक्षित सफर सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।
सुरक्षित
ड्राइविंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू 'टायर
और वाहन की स्थिति' है।
एक्सप्रेस-वे पर लंबी दूरी तक तेज गति से वाहन चलाने पर टायरों के भीतर की हवा
गर्म होकर फैलती है। यदि टायर पुराने हैं या उनमें हवा का दबाव सही नहीं है, तो उनके फटने की
संभावना बढ़ जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्सप्रेस-वे पर चलने से पहले
टायरों की जांच करना उतना ही जरूरी है जितना पेट्रोल भरवाना। इसके साथ ही 'हाइवे हिप्नोसिस' जैसी स्थिति से भी
लोगों को आगाह करना आवश्यक है। लंबी, सीधी
और बिना किसी बाधा वाली सड़क पर लगातार गाड़ी चलाते समय ड्राइवर का मस्तिष्क एक
प्रकार की अर्ध-निद्रा या शून्यता की स्थिति में चला जाता है। इससे बचने के लिए हर
दो-तीन घंटे में छोटा विश्राम लेना और वाहन से बाहर निकलकर शरीर को गति देना
अनिवार्य है।
शिक्षा और
जागरूकता के स्तर पर हमें स्कूलों से ही शुरुआत करनी होगी। सड़क सुरक्षा को केवल
एक पाठ्यपुस्तक का अध्याय नहीं, बल्कि
जीवन कौशल के रूप में सिखाया जाना चाहिए। जब तक एक चालक यह महसूस नहीं करेगा कि
उसके पीछे वाली सीट पर बैठा परिवार या सामने से आ रहा अजनबी भी किसी के घर का
चिराग है, तब
तक कोई भी तकनीक हादसों को नहीं रोक सकती। तकनीक की बात करें तो 'इंटेलिजेंट ट्रैफिक
मैनेजमेंट सिस्टम' (ITMS) का
विस्तार करना होगा। हर कुछ किलोमीटर पर स्पीड कैमरे और रडार होने चाहिए जो नियम
तोड़ने वालों को तत्काल संदेश भेजें। लेकिन दंड से अधिक महत्वपूर्ण 'बोध' है। लोगों को यह
समझाना होगा कि 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार रोमांच तो दे सकती है, लेकिन वह गलती
सुधारने का मौका नहीं देती।
एक्सप्रेस-वे
पर एक और बड़ी समस्या आवारा पशुओं और पैदल चलने वालों की है। यद्यपि एक्सप्रेस-वे
को पूरी तरह 'एक्सेस
कंट्रोल्ड' बनाया
जाता है, लेकिन
अक्सर बाड़ या फेंसिंग को काटकर लोग और पशु अंदर आ जाते हैं। यहाँ प्रशासन की
जिम्मेदारी बनती है कि वह निरंतर गश्त और मजबूत फेंसिंग सुनिश्चित करे। साथ ही, आस-पास के गांवों के
लोगों को यह समझाना होगा कि इन सड़कों पर पैदल चलना या जानवर चराना आत्मघाती कदम
है। सड़क सुरक्षा केवल ड्राइवर की नहीं, बल्कि
समाज के हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो उस बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।
एक्सप्रेस-वे हमारे
विकसित होते भारत के गौरव हैं। गंगा एक्सप्रेस− वे और दिल्ली− देहरादून एक्सप्रेस−वे,दिल्ली-मुंबई
एक्सप्रेस-वे हो या पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे,
ये हमारी प्रगति के सूचक हैं। लेकिन इस प्रगति को पूर्ण तभी
माना जाएगा जब इन पर चलने वाला हर व्यक्ति सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचे। हमें
अपनी ड्राइविंग की आदतों में बदलाव लाना होगा। सीट बेल्ट बांधना, मोबाइल का प्रयोग न
करना, शराब
पीकर गाड़ी न चलाना और लेन का पालन करना—ये
बहुत छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन
ये ही जीवन और मृत्यु के बीच की पतली लकीर हैं। सड़क पर आपकी सुरक्षा आपके हाथ में
है, और
आपकी समझदारी में ही पूरे समाज का हित है। आधुनिक
भारत की इन तेज रफ्तार सड़कों को सुरक्षित सफर की मिसाल बनाना भी सरकार के साथ
प्रत्येक वाहन चालक की जिम्मेदारी है।
एक बात और
सफर आसान करने के लिए हम दो शहरों के बीच
एकसप्रेस−वे बना रहे हैं किंतु शहरों के अंदर बढ़ते ट्रैफिक और
लगते जाम पर हम ध्यान नही दे रहे। लाल
बत्ती को समाप्त करने के उपाए तेजी से
खोजने होंगे। शहर में भी लेन
व्यवस्था सख्ती से लागू करनी होगी। गलत
ढंग से वाहन चलाने वालों के विरूद्ध कठोर
निर्णय लेने होंगे। यातायात में सुधार के लिए बहुत कुछ करना
होगा।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार
हैं)
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