Sunday, December 14, 2025

अमर उजाला की स्थापना के 25 साल पूरे होने पर अखबार में मेरा लेख

 12 दिसम्बर को अमर उजाला मेरठ 32वे साल में प्रवेश पर गया।इस गौरवशाली पल के लिए अमर उजाला प्रबधन को बधाई।


Sunday, December 12, 2010

अमर उजाला मेरठ के 25वें साल में प्रवेश

मेरा यह लेख अमर उजाला मेरठ के 25वें साल में प्रवेश पर मेरठ के सभी संसकरण में छपा है

सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल

हर मुश्किल वक्त की कसौटी पर खरा उतरा अमर उजाला, दफ्तर में आग लगी तब भी अखबार का प्रकाशन नहीं होने दिया प्रभावित

अमर उजाला सदैव सत्य का पक्षधर रहा है। चाहे उसके पत्रकारों को एनएसए लगाकर जेल डालने का प्रयास किया गया हो या फिर सचाई को उजागर करने वाले पत्रकारों की हत्या की गई हो, अमर उजाला के कदम हर मुश्किल वक्त में निर्बाध रूप से आगे बढ़ते रहे। 24 वर्ष के स्वर्णिम सफर में समाज को जागरूक करने के साथ-साथ अमर उजाला अपने अंदर भी कई बदलाव लाया है। इस सफर में अमर उजाला को कई खट्टे-मीठे उतार चढ़ाव का भी सामना करना पड़ा है।

अमर उजाला मेरठ के प्रकाशन के कुछ समय बाद ही उत्तरांचल के साथी उमेश डोभाल की वहां के शराब माफियाओं ने हत्या कर दी, तो एक रात आफिस से कार से घर लौटते समय ट्रक से टकराने पर डेस्क के साथी नौनिहाल शर्मा काल के गले में चले गए। अमर उजाला के गंगोह के साथी राकेश गोयल पर प्रशासन के विरुद्ध खबर लिखने पर एनएसए लगी। भाकियू के आंदोलन में स्वामी ओमवेश के साथ लेखक को भी एनएसए में निरुद्ध करने का प्रयास किया।

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सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल

हर मुश्किल वक्त की कसौटी पर खरा उतरा अमर उजाला, दफ्तर में आग लगी तब भी अखबार का प्रकाशन नहीं होने दिया प्रभावित


बिजनौर में बरेली से अमर उजाला आता था। बरेली की दूरी ज्यादा होने के कारण समाचार समय से नहीं जा पाते थे। सीधी फोन लाइन बरेली को नहीं थी। कभी मुरादाबाद को समाचार लिखाने पड़ते तो कभी लखनऊ को। एक-दो बार दिल्ली भी समाचार नोट कराने का मौका मिला। ऐसे में तय हुआ कि बिजनौर को सीधे टेलीपि्रंटर लाइन से जोड़ा जाए। इसके लिए कार्य भी प्रारंभ हो गया। एक दिन श्री राजुल माहेश्वरी जी का फोन आया कि टीपी लाइन बरेली से नहीं मेरठ से देंगे। वहां से नया एडीशन शुरू होने जा रहा है।

मेरठ में कहां, क्या हो रहा है?, यह जानने की उत्सुकता थी तो मै और मेरे साथी कुलदीप सिंह एक दिन बस में बैठ मेरठ चले गए। मेरठ में वर्तमान आफिस की साइड में पुराना आफिस होता था। उसके हाल में एक मेज पर राजेंद्र त्रिपाठी बैठे मिले। राजेंद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता बिजनौर से ही शुरू की थी, इसलिए पुराना परिचय था। उन्होंने मेरठ के प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी दी और पूरी यूनिट लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

12 दिसंबर 1986 का दिन आया और समाचार पत्र का पूजन के साथ शुभारंभ हुआ। बिजनौर के लिए समाचार पत्र नया नहीं था। पूरा नेटवर्क भी बना था सो परेशानी नहीं आई। बिजनौर में समाचार पत्र लाने-ले जाने के लिए बरेली की ही टैक्सी लगी। बिजनौर-बरेली रूट पर एंबेसडर गाड़ी लगी । इसका चालक लच्छी था। कई दिन उसके साथ अखबार मेरठ से लाना पड़ा। फरवरी 87 में हरिद्वार लोकसभा क ा उपचुनाव हुआ। चूंकि अमर उजाला का नेटवर्क पूरी तरह नहीं बना था, इसलिए मुझे उस चुनाव का कवरेज करने के लिए भेजा गया और मैने पूरे चुनाव के दौरान रुड़की और हरिद्वार से चुनाव कवरेज भेजी।

तब टाइपराइटर से अखबार छापा गया

अमर उजाला मेरठ को इन 24 साल में कई खट्टे-मीठे अनुभव का सामना करना पड़ा। पहले समाचार टाइप होते । उनके पि्रंट निकलते और उन्हे पेज के साइज के पेपर पर चिपकाया जाता था। अब यह काम कंप्यूटर करता है। समाचार के पि्रंट निकालने के लिए दो पि्रंटर होते थे। एक पि्रंटर खराब हो गया। उसे ठीक करने इंजीनियर दिल्ली से आया किंतु वह खराबी नहीं पकड़ पाया। उसने खराब प्रिंटर को सुधारने के लिए चालू दूसरे प्रिंटर को खोल दिया, जिससे चालू प्रिंटर भी खराब हो गया। ऐसे में समस्या पैदा हो गई कि कैसे अखबार निकले? तय किया गया कि खबरें टाइपराइटर पर टाइप करवाई जाएं। सो कुछ पुरानी खबरें , कुछ इधर-उधर से आए समाचार लगाकर अखबार निकाला गया। इस अंक की विश्ेष बात यह रही कि इसमें अधिकतर खबरें और उनके हैडिंग टाइपराइटर से टाइप किए थे।

आग भी नहीं रोक पाई संस्करण को

ऐसे ही एक रात शॉर्ट सर्किट से अमर उजाला मेरठ के कार्यालय में आग लग गई । करीब सौ कंप्यूटर जल गए। ऐसी हालत में अखबार निकालना एक चुनौती थी। किंतु अगले दिन का अंक पूर्ववत: निकला और अखबार पर इस घटना का कोई असर दिखाई नहीं दिया। अमर उजाला का विस्तार क्षेत्र कभी गाजियाबाद नोएडा दिल्ली, बुलंदशहर और पूरे गढ़वाल में था। प्रसार बढ़ने के साथ नए-नए संस्करण निकलते चले गए।

श्याम-श्वेत से रंगीन तक का सफर

24 साल में अमर उजाला में बहुत परिवर्तन आया आठ पेज का अखबार आज औसतन 20 पेज पर आ गया। श्याम-श्याम में छपने वाला अमर उजाला आज पूरी तरह रंगीन हो गया। पहले स्थानीय महत्वपूर्ण समाचार अंतिम पेज पर छपते थे और बाकी उसी के पिछले के पेपर पर छपती थी। इसके बाद पेज पांच से स्थानीय समाचार छपने लगे और अब ये पेज दो से शुरू होने लगे। अनेक प्रकार के झंझावात और परेशानी को झेलते हुए अमर उजाला मेरठ 25 साल में प्रवेश कर रहा है। किंतु वह अपने रास्ते से नहीं भटका। जनसमस्या उठाने से कभी मुंह नहीं मोड़ा। समय के साथ कदम से कदम मिलाने में कभी झिझक नहीं महसूस की। समाचार पत्र नए जमाने के तेवर और तकनीक से तालमेल बनाने के प्रयास हमेशा जारी रहे।

मुरारी लाल महेश्वरी और अतुल महेश्वरी के निधन के बाद भी अमर उजाला की मशीन बंद नहीं हुए परिवार के सदस्य अंतिम संस्कार में लग रहे बाकी स्टाफ ने पहले की तरह काम किया और अखबार वैसे ही निकला जैसे निकलता था मुलायम सिंह की सरकार में अमर उजाला और जागरण के खिलाफ हल्ला बोल अभियान शुरू किया गया दोनों अखबारों के हो करो एजेंट और पत्रकारों को पीटा गया इसके बावजूद भी अखबार नहीं झुके और लास्ट में माफी मांगने के लिए मुलायम सिंह यादव अमर उजाला के संपादक अशोक अग्रवाल के घर गए अमर उजाला अशोक अग्रवाल के सामने मुलायम सिंह यादव का हाथ जोड़ फोटो छापकर इस कहानी का अंत किया

मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे जिन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला। उनका राजनीतिक सफर समाजवादी विचारधारा और पिछड़ा वर्ग की राजनीति से जुड़ा रहा। हालांकि उनके मुख्यमंत्री काल में कई विवादास्पद घटनाएं हुईं जिनमें से एक प्रमुख था अमर उजाला और दैनिक जागरण समाचार पत्रों के खिलाफ चलाया गया हल्ला बोल अभियान। यह अभियान मीडिया और राजनीति के बीच टकराव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया और लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता के प्रश्न को उजागर किया।

यह घटना मुख्य रूप से मुलायम सिंह यादव के दूसरे मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान 2003-2007 के बीच की अवधि से संबंधित है। उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। अमर उजाला और दैनिक जागरण उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े हिंदी समाचार पत्र थे जिनकी पहुंच और प्रभाव राज्य भर में व्यापक था। इन दोनों अखबारों ने समाजवादी पार्टी की सरकार की नीतियों और कार्यशैली की आलोचना करने वाली खबरें प्रकाशित कीं।

मुलायम सिंह यादव की सरकार के खिलाफ इन समाचार पत्रों में कई आरोप प्रकाशित किए गए थे। इनमें प्रशासनिक विफलता, कानून व्यवस्था की खराब स्थिति, भ्रष्टाचार के आरोप और सरकार की विभिन्न नीतियों की आलोचना शामिल थी। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराध, माफिया और अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण के आरोप इन अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते थे। समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं के विरुद्ध विभिन्न आरोपों को भी इन अखबारों ने प्रमुखता से छापा।

इसके अलावा इन समाचार पत्रों ने कुछ विशिष्ट घटनाओं और मुद्दों को भी उठाया जिनसे मुलायम सिंह यादव की सरकार की छवि खराब हुई। प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाए गए और सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही पर संदेह व्यक्त किया गया। कई बार इन अखबारों में संपादकीय और लेख प्रकाशित हुए जो सरकार के लिए आलोचनात्मक थे। मुलायम सिंह यादव और उनकी सरकार को लगा कि ये अखबार उनके खिलाफ एक सुनियोजित अभियान चला रहे हैं।

इस स्थिति के जवाब में मुलायम सिंह यादव की सरकार और समाजवादी पार्टी ने हल्ला बोल अभियान शुरू किया। यह अभियान इन दोनों समाचार पत्रों के खिलाफ एक संगठित विरोध था। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इन अखबारों का बहिष्कार करने के लिए कहा गया। कई स्थानों पर इन अखबारों की प्रतियां जलाई गईं और विरोध प्रदर्शन किए गए। पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इन अखबारों की आलोचना की और उन पर पक्षपात और झूठी खबरें छापने के आरोप लगाए।

हल्ला बोल अभियान के दौरान समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि ये अखबार राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और किसी विशेष राजनीतिक दल के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। यह दावा किया गया कि विपक्षी दलों और उनके समर्थक व्यवसायिक घराने इन अखबारों को प्रभावित कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि पत्रकारिता के नाम पर एकतरफा और भ्रामक समाचार पर



हल्ला बोल अभियान के दौरान समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि ये अखबार राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और किसी विशेष राजनीतिक दल के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। यह दावा किया गया कि विपक्षी दलों और उनके समर्थक व्यवसायिक घराने इन अखबारों को प्रभावित कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि पत्रकारिता के नाम पर एकतरफा और भ्रामक समाचार प्रकाशित किए जा रहे हैं जो जनता को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थकों का मानना था कि ये अखबार समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार की उपलब्धियों को नजरअंदाज करते हैं और केवल नकारात्मक पहलुओं को उजागर करते हैं।

समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किए। कई शहरों और कस्बों में इन अखबारों की प्रतियों को सार्वजनिक रूप से जलाया गया। अखबारों के दफ्तरों के बाहर नारेबाजी की गई और धरना प्रदर्शन किए गए। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक सभाओं और मीडिया के सामने इन अखबारों की तीखी आलोचना की। कुछ स्थानों पर अखबार विक्रेताओं और वितरकों पर भी दबाव डाला गया कि वे इन अखबारों को न बेचें। हालांकि सरकारी तौर पर किसी प्रतिबंध की घोषणा नहीं की गई थी लेकिन व्यावहारिक रूप से इन अखबारों के वितरण और बिक्री में बाधाएं उत्पन्न की गईं।

इस अभियान ने मीडिया जगत में हलचल मचा दी और पूरे देश में इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई। पत्रकार संगठनों, मीडिया घरानों और नागरिक समाज के संगठनों ने इस अभियान की कड़ी निंदा की। इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया गया और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध कार्रवाई करार दिया गया। देश भर के पत्रकारों और संपादकों ने एकजुट होकर इस अभियान का विरोध किया। राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और मुलायम सिंह यादव की सरकार की आलोचना की।

विपक्षी दलों ने भी इस अवसर का लाभ उठाया और समाजवादी पार्टी पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया। भाजपा, कांग्रेस और बसपा जैसे दलों ने इस अभियान को लोकतंत्र विरोधी बताया और मुलायम सिंह यादव पर प्रेस को दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। विधानसभा में भी इस मुद्दे पर हंगामा हुआ और विपक्ष ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और प्रेस परिषद जैसे संस्थानों ने भी इस मामले में रुचि दिखाई और चिंता व्यक्त की।

अमर उजाला और दैनिक जागरण ने भी इस अभियान के खिलाफ मजबूती से अपना पक्ष रखा। दोनों अखबारों के संपादकों और प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि वे निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं और किसी राजनीतिक दबाव में नहीं आएंगे। उन्होंने कहा कि समाचार पत्र का कर्तव्य है कि वह सरकार की गलतियों और कमियों को उजागर करे चाहे कोई भी सत्ता में हो। इन अखबारों ने अपने समाचार कवरेज में कोई बदलाव नहीं किया और सरकार की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग जारी रखी। उन्होंने इस अभियान को भी अपने अखबारों में विस्तार से कवर किया और संपादकीय में इसकी निंदा की।

जनता की प्रतिक्रिया मिली जुली थी। समाजवादी पार्टी के कट्टर समर्थकों ने अभियान का समर्थन किया और अखबारों को पक्षपाती बताया। हालांकि एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इस अभियान को गलत माना और प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन किया। कई पाठकों ने इन अखबारों के प्रति अपना समर्थन जताया और उनकी बिक्री में कोई विशेष गिरावट नहीं आई। वास्तव में कुछ विश्लेषकों का मानना था कि इस विवाद ने इन अखबारों की लोकप्रियता को और बढ़ा दिया क्योंकि लोगों में यह जानने की उत्सुकता बढ़ी कि आखिर इन अखबारों में ऐसा क्या छप रहा है जिससे सरकार इतनी परेशान है।

हल्ला बोल अभियान कुछ सप्ताह तक जोरशोर से चला लेकिन धीरे-धीरे इसकी तीव्रता कम होती गई। इसके खत्म होने के पीछे कई कारण थे। सबसे महत्वपूर्ण कारण था राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यापक निंदा जिससे समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव की छवि को नुकसान पहुंच रहा था। यह अभियान उल्टा पड़ गया और जो अखबार सरकार की आलोचना कर रहे थे उन्हें और अधिक सहानुभूति मिलने लगी। मीडिया में यह चर्चा होने लगी कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन कर रही है और प्रेस की आजादी को कुचलने की कोशिश कर रही है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण था कि यह अभियान व्यावहारिक रूप से सफल नहीं हो रहा था। इन अखबारों की बिक्री और प्रसार पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। पाठक इन अखबारों को खरीदते रहे और अखबारों ने अपनी रिपोर्टिंग में कोई समझौता नहीं किया। जनता के एक बड़े वर्ग ने इस अभियान को नकारात्मक रूप से देखा और समाजवादी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा। पार्टी के भीतर भी कुछ नेताओं ने इस अभियान की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाए और सुझाव दिया कि इसे समाप्त किया जाना चाहिए।

तीसरा कारण था राजनीतिक दबाव और व्यावहारिक चुनौतियां। विपक्षी दल इस मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रहे थे और समाजवादी पार्टी को आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता था। पार्टी के रणनीतिकारों ने महसूस किया कि यह अभियान राजनीतिक रूप से हानिकारक साबित हो रहा है और इससे पार्टी की जमीनी स्तर पर छवि खराब हो रही है। मध्यम वर्ग और शहरी मतदाता जो समाचार पत्रों के नियमित पाठक थे वे इस अभियान से नाराज थे।

अंततः समाजवादी पार्टी के नेतृत्व ने धीरे-धीरे इस अभियान से दूरी बनानी शुरू कर दी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस विषय पर बोलना कम कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने स्वयं इस मुद्दे पर कोई विशेष बयान नहीं दिया और अभियान को अनौपचारिक रूप से समाप्त होने दिया गया। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए कि वे इन अखबारों के खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन न करें और मामले को शांत होने दें। कुछ हफ्तों में यह अभियान पूरी तरह से खत्म हो गया और स्थिति सामान्य हो गई।

हालांकि अभियान समाप्त हो गया लेकिन इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव लंबे समय तक रहे। इस घटना ने उत्तर प्रदेश में मीडिया और राजनीति के रिश्तों को प्रभावित किया। यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया कि किस तरह राजनीतिक दल मीडिया की आलोचना से नाराज होकर दबाव की रणनीति अपना सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में ऐसी रणनीति सफल नहीं होती। इस घटना ने प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को और अधिक रेखांकित किया और यह स्पष्ट हुआ कि लोकतंत्र में मीडिया को सरकार के कार्यों की निगरानी और आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है।

इस अभियान के बाद समाजवादी पार्टी और इन अखबारों के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे लेकिन कोई सीधा टकराव नहीं हुआ। अखबारों ने सरकार की निष्पक्ष रिपोर्टिंग जारी रखी और सरकार ने भी सीधे तौर पर इन अखबारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। 2007 में जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए तो समाजवादी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और मायावती के नेतृत्व में बसपा की सरकार बनी। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने माना कि हल्ला बोल अभियान जैसे विवादों ने भी समाजवादी पार्टी की हार में योगदान दिया।

यह घटना भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सबक बनी कि मीडिया के खिलाफ सीधा अभियान चलाना राजनीतिक रूप से हानिकारक हो सकता है। बाद के वर्षों में राजनीतिक दलों ने मीडिया से निपटने के लिए अधिक सूक्ष्म और परोक्ष तरीके अपनाए। हल्ला बोल अभियान प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है और यह दिखाता है कि लोकतंत्र में जनता और मीडिया की शक्ति राजनीतिक दबाव से अधिक मजबूत होती है।

• अशोक मधुप

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